पीएम मोदी से पूछिए उनका दर्द, जब वो श्रीहरिकोट गए थे तो क्या हुआ? पीएम के दर्द को जीतना मैं समझ सका आपको बता रहा हूं. पीएम पीएसएलबी की उड़ान के बाद वैज्ञानिकों को संबोधित कर रहे थे. अंग्रेजी में महारथ हासिल होती तो टेलीप्रॉम्पटर की जरूरत नहीं पड़ती. हालांकि अंग्रेजी जानने वाली भी टेलीप्रॉम्पटर लगाते हैं. लेकिन मोदी को बेहतर अंग्रेजी आती तो उसकी जरूरत नहीं पड़ती. टेलीप्रॉम्पटर देखकर अंग्रेजी में भाषण दे रहे थे. जब लड़खड़ा रहे थे तो हिंदी का इस्तेमाल कर रहे थे. उन्हें भी अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि जीतनी अच्छी हिंदी में बात कर लेते हैं उतनी अच्छी अंग्रेजी में नहीं. अंग्रेजी बोलना मजबूरी थी क्योंकि मौजूद कई वैज्ञानिकों को हिंदी नहीं आती थी. दूसरी ओर दुनिया को भी दिखाना था कि भारत के पीएम का विजन क्या है?
पीएम की बात छोड़िए खुद की बात करते हैं. विश्वास ना हो तो मार्कण्डेय सर से पूछ लीजिएगा. यूपी के देवरिया जिले में डूमरी के रहने वाले हैं. हमारे गांव पिंडी में ट्यूशन पढ़ाने आते हैं. अग्रेजी को हिंदी और हिंदी को अंग्रेजी में अनुवाद करके समझाते थे. इंटरमीडिएट की अंग्रेजी तो उन्हीं से पढ़ी. शुरू में तो पल्ले नहीं पड़ती थी. लेकिन मार्कण्डेय सर तो उस्ताद थे. पहले तो अंग्रेजी को अंग्रेजी में समझाने की कोशिश की लेकिन भोजपुरी बोलने वाला बालक सीधे अंग्रेजी को अंग्रेजी में कैसे समझ सकता था? फिर उन्होंने अंग्रेजी की कविताओं और कहानियों को हिंदी में अनुवाद करना शुरू किया और रट्टामार ज्ञान अर्जन की पद्धति से अंग्रेजी को हिंदी में समझाने लगे. धीरे-धीरे अंग्रेजी की दो-चार लाइने समझ में आने लगी. काफी मेहनत के बाद अंग्रेजी कुछ-कुछ समझ में आने लगी थी. मार्कण्डेय सर ने इतना मेहनत किया कि इंटरमीडिएट में अंग्रेजी विषय में पास करने में कोई कठिनाई नहीं हुई. रट्टामार के ही सही अंग्रेजी विषय में सिर्फ पास कर लिया. आगे भी अंग्रेजी की पढ़ाई करना चाहता था लेकिन उस समय की सोच के हिसाब से मुझे संभव नहीं लगा. मैं सोचता था कि इंटरमीडिएट की अंग्रेजी समझने के लिए इतना मेहनत करना पड़ा तो आगे क्या-क्या करना होगा? आप कह सकते हैं कि उस समय मेरी हिम्मत जवाब दे गई थी. जितना समय मैं अंग्रेजी के लिए देता था उसके दसवां हिस्सा भी किसी अन्य विषय के लिए नहीं दे पाता था.
दसवीं की पढ़ाई मैंने मामा के घर रह कर की. मोहम्मद युसूफ से अंग्रेजी का ट्यूशन लिया. शिवेश मामा भी कभी-कभी अंग्रेजी पढ़ाया करते थे. दसवीं में मैं गणित में तेज था लेकिन अंग्रेजी काफी खराब थी.
छवीं से आठवीं कक्षा तक डूमरी के ही तिवारी सर अंग्रेजी को रस में घोलकर पिलाते थे. गाना गाकर, कविताएं सुनाकर प्रेरित करते थे. कभी-कभी इंग्लैंड, अमेरिका की बात भी सुनाते थे. दो-चार लाइन अंग्रेजी बोलते थे तो सुनकर काफी अच्छा लगता था.
हम लोग भी अंग्रेजी बोलने की कोशिश करते थे लेकिन हमारी अंग्रेजी काफी मारक होती थी. जैसे- 'मारन टू लाठी, फोरन टू कपार...ओही पड़े जाइव पिंडी बाजार...' रजिया इज गोइंग टू कानपुर, आइ एम गोइंग टू आगरा. बस इतनी सी अंग्रेजी काफी लगती थी. तिवारी सर अंग्रेजी घोल-घोल कर पिलाते रहे. गीत गाकर सुनाते थे 'दही के नदिया के तेहूं किकोर दे... माई रे हमरा के रस तनी घोर दे...' इसी रस में अंग्रेजी घोलकर पिलाते थे. लेकिन उन्हें क्या पता था कि अंग्रेजी रस में घोलकर नहीं पिलाई जाती, उसे तो सीखना होता है और सीखने के लिए माहौल चाहिए, जो हमारे गांव, स्कूल और घर में नहीं था. 24 घंटे भोजपुरी बोली जाती थी. अगर हम लोग स्कूल में A for Apple रट कर जाते थे तो घर पर क से कुदाल और कबड्डी, ख से खरबुजा और खरगोश, ग से गेना (फुटबॉल) ही समझते थे क्योंकि स्थानीय, सामाजिक और जरूरत का माहौल कुछ ऐसा ही था. अधिकांश घरों में सुबह उठते ही घर और खेती के काम में आंशिक रूप से ही सही हाथ बंटाना होता था. गांवों में सबकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती कि नौकर रखकर काम कराए और बच्चों को पढ़ने के लिए गांव से दूर शहर में भेजे. बच्चे क्या करते, अपने ही माहौल में लड़-झगड़ कर आगे बढ़ते थे. कोई बाहर चला गया तो अच्छा नहीं तो गांव के गोंइडे के स्कूल में पढ़ाई हो जाती थी. मास्टर साहब का मन हुआ तो पढ़ा देते थे नहीं तो सुर्ती बनाते रहते थे.
समस्या सिर्फ यही नहीं थी. पांचवी तक अंग्रेजी का दर्शन नहीं हुआ. छठी क्लास से अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू हुई. A B C D E F G H रटते हुए स्कूल से घर की ओर भागते थे. एक हाथ से सरकते पैंट और दूसरे हाथ से बस्ता (स्कूल बैग) के साथ बैठने के लिए बोरा संभालते हुए घर के लिए चल पड़ते थे. A B C D, वन, टू, थ्री, फोर और एक ईकाई, दो ईकाई, तीन ईकाई... दो का दो, दो दूनी चार, दो चौके आठ के बीच के समझ को भी समझाने वाला कोई नहीं था. बस रट्टा मार लेते थे. सर जी पूछते थे तो शुरू हो जाते थे. 15 तक पहाड़ा, वन टू और गिनती सुनाने पर शाबाशी मिलती थी और इतना ही जानकर हम लोग तीसमार खान बनते थे. कोई समझाने वाला नहीं था. कोई ये बताने वाला नहीं था कि क्या पढ़ें या क्या ना पढ़ें?
ऐसी स्थिति सिर्फ मेरी नहीं थी. देश के 60% से ज्यादा लोगों की कहानी यही है. चाहें वो हिंदी भाषी हों या मराठी या बंगाली या अन्य भाषाई हों. सबके पास इतनी सुविधा नहीं है कि अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ सकें. अपनी भाषा में ही रास्ते बनाने होंगे. हर व्यक्ति चाहता है कि वो अंग्रेजी, चीनी या रूसी पढ़े लेकिन ये नहीं चाहता कि ये भाषाएं उन पर थोपीं जाएं. अंग्रेजी की वहज से अपनी ही भाषा के प्रति हीनता मन को पीड़ा पहुंचाती है.
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (भोपाल) ने मुझे अंग्रेजी समझाया. 2005 तक पोस्ट ग्रेजुएट बन चुका था. 2006-08 तक भोपाल में रह कर पढ़ाई की. दिनकर सर अनुवाद पढ़ाने के लिए आते थे. काफी बारिकी से अंग्रेजी समझाया करते थे. सुलझे हुए वरिष्ठ पत्रकार हैं. जो कुछ भी अंग्रेजी की समझ मुझमें है वो दिनकर सर की वजह से है. अब भी मैं इसमें पारंगत नहीं हूं लेकिन काम भर का जानता हूं. धीरे-धीरे इसकी समझ बढ़ती जा रही है लेकिन बोल नहीं पाता हूं. जितना जानता हूं उसी के बल पर टीवी मीडिया में कायम हूं. आगे भी कोशिश होगी कि अंग्रेजी को और बेहतर करूं क्योंकि ये हमारी जरूरत है, मजबूरी नहीं.
भारतेंदु हरिशचंद्र ने कहा था 'अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन... पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन...निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल'. इन पंक्तियों में उन लोगों की पीड़ा छिपी है जो दिल्ली में यूपीएससी से सी-सैट हटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. सरकार से अपील है कि भारतीय भाषाओं की हत्या ना करे, संजीवनी दे ताकि 'भारत' बचा रहे.
पीएम की बात छोड़िए खुद की बात करते हैं. विश्वास ना हो तो मार्कण्डेय सर से पूछ लीजिएगा. यूपी के देवरिया जिले में डूमरी के रहने वाले हैं. हमारे गांव पिंडी में ट्यूशन पढ़ाने आते हैं. अग्रेजी को हिंदी और हिंदी को अंग्रेजी में अनुवाद करके समझाते थे. इंटरमीडिएट की अंग्रेजी तो उन्हीं से पढ़ी. शुरू में तो पल्ले नहीं पड़ती थी. लेकिन मार्कण्डेय सर तो उस्ताद थे. पहले तो अंग्रेजी को अंग्रेजी में समझाने की कोशिश की लेकिन भोजपुरी बोलने वाला बालक सीधे अंग्रेजी को अंग्रेजी में कैसे समझ सकता था? फिर उन्होंने अंग्रेजी की कविताओं और कहानियों को हिंदी में अनुवाद करना शुरू किया और रट्टामार ज्ञान अर्जन की पद्धति से अंग्रेजी को हिंदी में समझाने लगे. धीरे-धीरे अंग्रेजी की दो-चार लाइने समझ में आने लगी. काफी मेहनत के बाद अंग्रेजी कुछ-कुछ समझ में आने लगी थी. मार्कण्डेय सर ने इतना मेहनत किया कि इंटरमीडिएट में अंग्रेजी विषय में पास करने में कोई कठिनाई नहीं हुई. रट्टामार के ही सही अंग्रेजी विषय में सिर्फ पास कर लिया. आगे भी अंग्रेजी की पढ़ाई करना चाहता था लेकिन उस समय की सोच के हिसाब से मुझे संभव नहीं लगा. मैं सोचता था कि इंटरमीडिएट की अंग्रेजी समझने के लिए इतना मेहनत करना पड़ा तो आगे क्या-क्या करना होगा? आप कह सकते हैं कि उस समय मेरी हिम्मत जवाब दे गई थी. जितना समय मैं अंग्रेजी के लिए देता था उसके दसवां हिस्सा भी किसी अन्य विषय के लिए नहीं दे पाता था.
दसवीं की पढ़ाई मैंने मामा के घर रह कर की. मोहम्मद युसूफ से अंग्रेजी का ट्यूशन लिया. शिवेश मामा भी कभी-कभी अंग्रेजी पढ़ाया करते थे. दसवीं में मैं गणित में तेज था लेकिन अंग्रेजी काफी खराब थी.
छवीं से आठवीं कक्षा तक डूमरी के ही तिवारी सर अंग्रेजी को रस में घोलकर पिलाते थे. गाना गाकर, कविताएं सुनाकर प्रेरित करते थे. कभी-कभी इंग्लैंड, अमेरिका की बात भी सुनाते थे. दो-चार लाइन अंग्रेजी बोलते थे तो सुनकर काफी अच्छा लगता था.
हम लोग भी अंग्रेजी बोलने की कोशिश करते थे लेकिन हमारी अंग्रेजी काफी मारक होती थी. जैसे- 'मारन टू लाठी, फोरन टू कपार...ओही पड़े जाइव पिंडी बाजार...' रजिया इज गोइंग टू कानपुर, आइ एम गोइंग टू आगरा. बस इतनी सी अंग्रेजी काफी लगती थी. तिवारी सर अंग्रेजी घोल-घोल कर पिलाते रहे. गीत गाकर सुनाते थे 'दही के नदिया के तेहूं किकोर दे... माई रे हमरा के रस तनी घोर दे...' इसी रस में अंग्रेजी घोलकर पिलाते थे. लेकिन उन्हें क्या पता था कि अंग्रेजी रस में घोलकर नहीं पिलाई जाती, उसे तो सीखना होता है और सीखने के लिए माहौल चाहिए, जो हमारे गांव, स्कूल और घर में नहीं था. 24 घंटे भोजपुरी बोली जाती थी. अगर हम लोग स्कूल में A for Apple रट कर जाते थे तो घर पर क से कुदाल और कबड्डी, ख से खरबुजा और खरगोश, ग से गेना (फुटबॉल) ही समझते थे क्योंकि स्थानीय, सामाजिक और जरूरत का माहौल कुछ ऐसा ही था. अधिकांश घरों में सुबह उठते ही घर और खेती के काम में आंशिक रूप से ही सही हाथ बंटाना होता था. गांवों में सबकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती कि नौकर रखकर काम कराए और बच्चों को पढ़ने के लिए गांव से दूर शहर में भेजे. बच्चे क्या करते, अपने ही माहौल में लड़-झगड़ कर आगे बढ़ते थे. कोई बाहर चला गया तो अच्छा नहीं तो गांव के गोंइडे के स्कूल में पढ़ाई हो जाती थी. मास्टर साहब का मन हुआ तो पढ़ा देते थे नहीं तो सुर्ती बनाते रहते थे.
समस्या सिर्फ यही नहीं थी. पांचवी तक अंग्रेजी का दर्शन नहीं हुआ. छठी क्लास से अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू हुई. A B C D E F G H रटते हुए स्कूल से घर की ओर भागते थे. एक हाथ से सरकते पैंट और दूसरे हाथ से बस्ता (स्कूल बैग) के साथ बैठने के लिए बोरा संभालते हुए घर के लिए चल पड़ते थे. A B C D, वन, टू, थ्री, फोर और एक ईकाई, दो ईकाई, तीन ईकाई... दो का दो, दो दूनी चार, दो चौके आठ के बीच के समझ को भी समझाने वाला कोई नहीं था. बस रट्टा मार लेते थे. सर जी पूछते थे तो शुरू हो जाते थे. 15 तक पहाड़ा, वन टू और गिनती सुनाने पर शाबाशी मिलती थी और इतना ही जानकर हम लोग तीसमार खान बनते थे. कोई समझाने वाला नहीं था. कोई ये बताने वाला नहीं था कि क्या पढ़ें या क्या ना पढ़ें?
ऐसी स्थिति सिर्फ मेरी नहीं थी. देश के 60% से ज्यादा लोगों की कहानी यही है. चाहें वो हिंदी भाषी हों या मराठी या बंगाली या अन्य भाषाई हों. सबके पास इतनी सुविधा नहीं है कि अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ सकें. अपनी भाषा में ही रास्ते बनाने होंगे. हर व्यक्ति चाहता है कि वो अंग्रेजी, चीनी या रूसी पढ़े लेकिन ये नहीं चाहता कि ये भाषाएं उन पर थोपीं जाएं. अंग्रेजी की वहज से अपनी ही भाषा के प्रति हीनता मन को पीड़ा पहुंचाती है.
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (भोपाल) ने मुझे अंग्रेजी समझाया. 2005 तक पोस्ट ग्रेजुएट बन चुका था. 2006-08 तक भोपाल में रह कर पढ़ाई की. दिनकर सर अनुवाद पढ़ाने के लिए आते थे. काफी बारिकी से अंग्रेजी समझाया करते थे. सुलझे हुए वरिष्ठ पत्रकार हैं. जो कुछ भी अंग्रेजी की समझ मुझमें है वो दिनकर सर की वजह से है. अब भी मैं इसमें पारंगत नहीं हूं लेकिन काम भर का जानता हूं. धीरे-धीरे इसकी समझ बढ़ती जा रही है लेकिन बोल नहीं पाता हूं. जितना जानता हूं उसी के बल पर टीवी मीडिया में कायम हूं. आगे भी कोशिश होगी कि अंग्रेजी को और बेहतर करूं क्योंकि ये हमारी जरूरत है, मजबूरी नहीं.
भारतेंदु हरिशचंद्र ने कहा था 'अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन... पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन...निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल'. इन पंक्तियों में उन लोगों की पीड़ा छिपी है जो दिल्ली में यूपीएससी से सी-सैट हटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. सरकार से अपील है कि भारतीय भाषाओं की हत्या ना करे, संजीवनी दे ताकि 'भारत' बचा रहे.
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