Friday, September 26, 2014

मुझे क्या?

पीएम ने 15 अगस्त को कहा था अब फिर 2 अक्टूबर को वहीं अपील करने जा रहे हैं. कुछ तो साफ सुथरा रहो भाई? पड़ोसी का नहीं अपना घर तो कम से कम साफ रखो. पीएम तो खुद झाड़ू उठाने को तैयार हैं, आप कब उठाएंगे. सीमा पर मरने की बात मत सोचो, घर में जीने का जुगाड़ करो. सीमा तो सेना संभाल रही है कम से कम घर तो आप संभाल लो. यही बात पीएम हम सबसे कह रहे हैं. याद है मुझे, शायद आपको भी याद होगा 15 अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की जनता से दिल की बात कर रहे थे. मोदी अर्थव्यस्था के आंकड़ों का जिक्र नहीं कर रहे थे. मेरा क्या? मुझे क्या? विकास, बलात्कार, भ्रष्टाचार, रहन-सहन, साफ-सफाई, भ्रूण हत्या का जिक्र कर रहे थे. उनकी बातों में जनता से एक अपील थी. हम नहीं सुधरेंगे तो कुछ नहीं सुधरेगा की बात कर रहे थे. पीएम मोदी का भाषण बहुत भावुक और जोशिला था. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पीएम मोदी करीब सवा घंटे तक देश की जनता से अपील करते रहे. मैं भी दफ्तर में पीएम का भाषण बड़ी गौर से सुन रहा था. ऐसा लग रहा था कि पीएम के इस जोरदार भाषण का असर जनता पर जरूर होगा. लेकिन जैसे भी पीएम का भाषण खत्म हुआ और लोग लालकिले के परिसर से अपने घर लौटने लगे तो जो तस्वीर हमारे सामने आई उससे मुझे काफी पीड़ा हुई. तस्वीर देखकर मुझे पीएम के भाषण का वो हिस्सा याद आया जिसमें वो मेरा क्या, मुझे क्या?’ का जिक्र कर रहे थे. यह तसवीर है, पीएम के भाषण के बाद लालक़िले के मैदान की. मोदी ने कितनी ज़ोरदार अपील की थी सफ़ाई रखने की और देखिए पीएम के भाषण पर तालियां बजाने वालों ने कैसे एक कान से सुन कर उसे दूसरे कान से निकाल दिया.

अब सवाल ये है कि क्या पीएम मोदी ने मेरा क्या, मुझे क्या?’ सिर्फ भ्रष्टाचार के संदर्भ में कहा था? जनता की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? आखिर कब तक मुझे क्यासफाई तो सरकार का काम है, कहकर अपनी जिम्मेदारी से हम भागते रहेंगे?   
प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत गहरी बात की थी और देश की बहुत सारी समस्याओं की जड़ भी यही है. मोदी का संदेश था कि देश नेताओं, सरकारों से नहीं जनता से बनता है. जनता सुधरेगी तो देश आगे बढ़ेगा. जनता साफ-सफाई रखेगी तो देश चमकेगा. अगर सरकारें साफ-सफाई करवा भी दें तो क्या फर्क पड़ेगा जब तक हम पान, गुटखा खा कर थूकना और सड़कों पर कचरे डालना बंद नहीं करेंगे? क्या देश बनाने में जनता की भागीदारी नहीं होनी चाहिए? क्या मेरा क्या, मुझे क्या?’ से आगे बढ़कर साफ-सफाई अपना कर्तव्य मानकर हम ये काम नहीं कर सकते? मोदी तो सिर्फ थोड़ा सहयोग चाहते हैं. मोदी ने बिल्कुल सही बात कही देश बनाना है तो जनता भी कुछ करे! अगर देश का हर नागरिक एक-एक क़दम उठाये तो सवा अरब क़दम उठ जायेंगे!मोदी की बात में दम भी है. जनता ख़ुद को बदलना न चाहे और देश को बदलने का सपना देखे तो वह भला कैसे पूरा हो सकता है?
 मोदी का सवाल सीधा और बड़ा है. बलात्कार के खिलाफ आवाज उठाना, भ्रूण हत्याएं रोकना, साफ़-सफ़ाई रखाने के प्रति जागरूकता  क्या देश के नागरिकों की ज़िम्मेदारी नहीं? हैरानी की बात ये है कि लोगों ने मोदी का भाषण बड़े उत्साह से सुना. हर अच्छी बात पर तालियां भी बजाई. लेकिन भाषण खत्म होने के बाद लोग वहां से जाने लगे तो लालकिले के परिसर में पानी की खाली बोतलें, चिप्स के खाली पैकेट्स, केले के छिलके छोड़कर चलते बने. आखिर में लोग प्रधानमंत्री की अपील को अनसुना क्यों कर दिए? लोगों ने दस मिनट में ही सबकुछ क्यों भूला दिया? क्या जनता का काम सिर्फ सरकार पर सवाल उठाना होता है या कुछ सवालों का जवाब भी देना होता है? अगर ऐसे ही रहना है तो सरकारों को गलत ठहराना बंद होना चाहिए. पीएम की इतनी बड़ी बात लोगों को दस मिनट भी याद नहीं , साफ़-सफ़ाई रखने की बेहद मामूली-सी बात भी लोग मान नहीं सके, तो बलात्कार और भ्रूण हत्याओं जैसे मुद्दों पर वे किसी की क्या सुनेंगे? लोगों को करना क्या था? किसी की जेब से कुछ जाना नहीं था. अपना कचरा ख़ुद समेट लेते, रास्ते में कहीं न कहीं कोई डस्टबिन दिखता, उसमें फेंक देते और घर चले जाते, लेकिन नहीं. शायद लोग इस भरोसे अपनी गंदगी छोड़ गए कि कचरा साफ़ करने वाला कोई होगा, वह करेगा, मुझे क्या? मोदी ने भी अपने भाषण में यही सवाल उठाया था कि सरकारी कर्मचारी कहता है, मेरा क्या, मुझे क्या? तो सिर्फ़ सरकारी कर्मचारी ही नहीं, यहां तो हर कोई कहता है मुझे क्या? अगर जनता भी सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों की तरह मेरा क्या, मुझे क्या?’ से बाहर नहीं निकली तो इस देश का कुछ नहीं हो सकता चाहे मोदी हजारों बार लालकिले से अपील करें. गांधी जी के बाद कई लोगों ने समाज की गंदगी साफ करने की कोशिश की. थोड़ी बहुत कामयाबी तो मिली लेकिन वो कामयाबी काफी नहीं है. अब मोदी समाज की गंदगी साफ करना चाहते हैं क्या आप सभी इस अभियान में शामिल नहीं होंगे? भले ही कुछ लोग मोदी को पसंद ना करता हो लेकिन अपनी सेहत के लिए साफ-सफाई रखने में क्या हर्ज है? ‘मेरा क्या, मुझे क्या?’ से निकलकर देश के लिए काम करने में क्या हर्ज है?