Saturday, August 29, 2015

#मोहन_राकेश #ऑस्ट्रेलिया #हिंदी

ऑस्ट्रेलिया में "आषाढ़ का एक दिन" का मंचन
"…फिर धीरे-धीरे धीमा पड़कर विलीन हो जाता है। परदा धीरे-धीरे उठता है।" ~ मोहन राकेश, 'आषाढ़ का एक दिन'
 “आषाढ का पहला दिन और ऐसी वर्षा माँ! ऐसी धारासार वर्षा! दूर-दूर तक की उपत्यकाएँ भीग गईं।”
~ मोहन राकेश, ‘आषाढ़ का एक दिन’


 हम लोग थियेटर में बैठकर "आषाढ़ का एक दिन" देखने को तैयार है! क्या बात है

तस्वीरें @iawoolford के ट्विटर वॉल से ली गई हैं।

Friday, August 7, 2015

खुशियों और ख्वाहिशों का बज़ट!

बज़ट हर महीने बनाती हूँ अपनी खुशियों और ख्वाहिशों का बज़ट। और देखों ये हर महिने बढ़ जाता है। ऐसे तो नज़र लग जाएंगी हमें ...सुनों तुम आते समय कुछ काले धागे और नींबू मिर्च की वो लटकन लेते आना। मैं क्या करूं , तुम्हारी मोहब्बत की सुर्खियां मेरे चेहरे पर झिलमिलाती है...सबको दिख ही जाती है। मुझे श्रृंगार की ज़रूरत ही नही पड़ती ख़ुद को सवांरने के लिए। बस बहुत होती है उम्मीदों की एक छोटी सी लाल बिंदी और सदके का काज़ल। सारे सपनों को चोटी से बाँध कर विश्वास का एक गज़रा लगा लेती हूँ।
जब भी घर से निकलती हूँ लोग उचक उचक कर देखते है, इन खुशियों की चमक को जो मंद मंद मुस्कान बन कर मेरे अधरों पर बिखरी रहती है। गाहे बगाहे कोई न कोई पूछ ही लेता है, इस अद्भुत सौंदर्य का कारण। सोचती हूँ क्या-क्या बताऊँ इन्हें अपने इस अलौकिक प्रेम के बारे में। हम अज़नबी से पक्के दोस्त बने, दोस्त से प्यार के पंछी बने , फ़िर हमसफ़र बने और उसके बाद पति-पत्नी। हमारे रिश्ते का ये बीज़ जो बोया था हमने 13साल पहले, वक़्त की खाद और धैर्य के पानी से सींचा है, तभी तो आज विश्वास के फूल आते है इसपे जिसका

मैं गज़रा लगाती हूँ। फ़िर सोचती हूँ इन्हें बता के क्या करूँगी? ये जो रिश्ता है अपना तुम जानते हो मैं जानती हूँ, बहुत है इतना। बस तुम को काला धाग़ा लेते आना उसे बांध दूँगी घर के बाहर ताकि किसी की बुरी नज़र न लगे मेरे घर के बढ़ते बज़ट को...!

संध्या कश्यप के फेसबुक वॉल से... 

वाल्मीकि से भी महर्षि की उपाधि छीन लो…

अच्छा हुआ ऋषिवर आप इस युग में पैदा नहीं हुए वरना एक डाकू को हमारी मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी महर्षि बनने नहीं देते। रत्नाकर कभी भी संन्यास नहीं ले पाता। रामायण की जगह वो ‘अधूरा ख्वाब’ लिखा होता। हम उसकी समीक्षा छापते और उसकी लेखन शैली की तारीफ करते नहीं अघाते। सच्चिदानंद तो अव्वल दर्जे का मूरख है।

 दिल्ली-एनसीआर में बियर शॉप और रियल स्टेट का कारोबार। एक आम आदमी के लिए ये बहुत बड़ा सपना। और तुम सबकुछ छोड़ छाड़कर सन्यासी बन गए। संन्यास लेना सबके बस की बात नहीं। वह भी तब जब वो संपन्न हो।जब आदमी अपने इन सपनों को पूरा करने के सुबह से शाम तक झूठ और फरेब करता है। कुछ जी तोड़ मेहनत करते हैं तब भी तुम जितना बना लिए थे वहाँ तक नहीं पहुंच पाते। तुमने ये सब हासिल कर भगवा चोला पहना। मोह माया से दूर हो गए। महामंडलेश्वर बन गए। लेकिन तुम्हारा अतीत तुम्हारे पीछे पड़ गया। यही मात खा गए महराज। उस समय पत्रकार के रूप में नारद जी थे।आज हम लोग हैं।ऐसा आग लगाये की गांजा पीने वाले संत भी आपके खिलाफ सुलगने लगे।भूल गए संन्यास और सन्यासी की परिभाषा। दौड़ पड़े कौए के पीछे बिना अपना कान चेक किये। 

सच्चिदानंद को फिर हमने बिल्डर बाबा बना दिया। महामंडलेश्वर की पदवी छिनवा ली। हमारा बस चले तो हम रत्नाकर उर्फ़ महर्षि वाल्मीकि से महर्षि का पद छीन लें। हम इस लोकतान्त्रिक देश में सर्वशक्तिशाली हैं। सनी लियोन पर पैनल डिस्कशन कराते हैं पर इतना नहीं जानते कि सारे सद्कर्म कुकर्म करने के बाद आई विरक्ति से ही संन्यास का रास्ता निकलता है।

(पत्रकार दृगराज मद्धेशिया के फेसबुक वॉल से.) 

Tuesday, August 4, 2015

वियना समझौते के मायने

यदि हम ईरान और अयातुल्ला खुमैनी को जानते हैं, यदि हम रूस, चीन और मध्य-पूर्व एशिया के देशों से ईरान के गहरे रिश्तों को जानते हैं, और यदि हम अमेरिका और यूरोपीय संघ के नेतृत्वकर्ता देशों को जानते हैं, तो यह कहने में हमें कोई हिचक नहीं होगी कि 18 दिनों की लंबी वार्ता के बाद दुनिया के 6 ताकतवर देशों और ईरान के बीच हुआ 14 जुलाई का वियना समझौता स्थाई नहीं है।

यह मानी हुई बात है, कि ईरान अपने संबधों का आधार नहीं बदलेगा और यूरो-अमरिकी साम्राज्यवाद वित्तीय ताकतों के गिद्धों का ऐसा समूह है, जो किसी भी देश के प्राकृतिक संपदा का मांस खाये बिना नहीं रह सकता। कह सकते हैं, कि दुनिया के बाजार में अमेरिकी डॉलर वित्तीय ताकतों का कारगर हथियार है। जिसका उपयोग अमेरिकी सरकार और साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में रखने के लिये कर रही है, जिसका मकसद वैकल्पिक व्यवस्था को रोकना है।
और हम इस बात को जानते हैं, कि चीन के युआन ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में वैकल्पिक मुद्रा व्यवस्था की चुनौतियां खड़ी कर दी है। एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक और ब्रिक्स बैंक की स्थापना भी हो गई है। जिसके प्रमुख सहयोगी ब्रिक्स देश- चीन, रूस, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका है। रूस, चीन और लातिनी अमेरिकी देशों के संगठनों की साझेदारी ने तथा एशिया के गैर अमेरिकी देशों, जिसमें ईरान भी है, की साझेदारी ने, नये भौगोलिक कूटनीतिक और सामरिक समीकरण को जन्म दे दिया है। जिसके सामने गैर अमेरिकी वैश्वीकरण है। मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करना है।

ईरान से हुए इस समझौते का सच यह है, कि यह समझौता ईरान को रूस और चीन के खेमे से निकालने की यूरो-अमेरिकी कवायद है, जिसमें रूस और चीन की भी मौजूदगी है और यहीं वह गंभीर सवाल है, कि क्या ओबामा सरकार और यूरोपीय देश इतने कामयाब हैं? क्या यह हो सकता है? इस समझौते के सबसे महत्वपूर्ण बिंदू के रूप में यह प्रचारित किया जा रहा है, कि ईरान अपने ऊपर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध को हटाने की शर्त पर परमाणु हथियारों का निर्माण रोकने पर राजी हो गया है। जबकि सच यह है, कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम में परमाणु हथियार बनाने जैसी कोई बात ही नहीं है, और इस बात को अमेरिका और यूरोपयी देश भी जानते हैं। अंतर्राष्ट्रीय पर्वेक्षकों की रिपोर्ट भी यही है। अमेरिकी गुप्तचर इकाई (सीआईए) की गुप्त रिपोर्ट से भी यही प्रमाणित होता है। इसके बाद भी उसे प्रतिबंधों का सामना बरसों करना पड़ा। जिसके खिलाफ रूस, चीन और उनके सहयोगी देशों एवं संगठनों का सहयोग ईरान को मिला।

क्या ईरान की कोई भी सरकार इस बात को भूल सकती है? या वह अपने कूटनीतिक एवं वित्तीय संबंधों का आधार बदल सकती है? ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वजह से उस पर पश्चिमी देशों ने जो प्रतिबंध लगाये, उसकी वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी नुक्सान उठाना पड़ा। अमेरिका के दबाव की वजह से ही यूरोपीय और अमेरिकी बैंकों में जमा किये गये धनराशि को जप्त करने से उसे 100 बिलियन डॉलर की क्षति हुई। उसके कई परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या कराई गयी, और इजरायल ने अमेरिका के साथ मिल कर ईरान के 'न्यूक्लियर प्रोडक्शन कम्प्यूटर सिस्टम' को एक वायरस के जरिये 'हैक' भी किया। ईरान के खाद्य पदार्थ और दवाओं के आयात को भी यूरो-अमेरिका ने रोक दिया। ईरान की अर्थव्यवस्था को तोड़ने, जन-असंतोष को बढ़ाने और उसकी राजनीतिक संरचना को बदलने की कोशिश की गई। दुनिया के सभी देशों पर प्रतिबंधों को लागू करने का दबाव बनाया गया।

और अब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस समझौते से ईरान का उपयोग रूस को कमजोर करने के लिये करना चाहते हैं। माना यही जा रहा है, कि यह समझौता रूस के विरुद्ध ओबामा की कूटनीतिक चाल है, जिसका मकसद रूस की अर्थव्यवस्था को ऐसा झटका देना है, कि वह वित्तीय संकट से उबर न पाये। जो काम वो यूक्रेन के माध्यम से करना चाहते थे, जहां उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा, अब वो ईरान के माध्यम से करने की नीति पर चल रहे हैं। इस समझौते के तहत तेहरान अपने परमाणु क्षमता को कम से कम 10 सालों तक उल्लेखनीय ढंग से सीमित रखेगा, और इसके बदले में दुनिया की 6 बड़ी शक्तियां इस बात से सहमत हैं, कि ईरान के खिलाफ लगे अंतर्राष्ट्रीय तेल एवं वित्तीय प्रतिबंधों को वो हटा लेंगी। यह प्रतिबंध अमेरिका, यूरोपीय देश उनके सहयोगी देशों (इजरायल सहित) के द्वारा पिछले 12 सालों से ईरान पर थोपा गया था। जिसका घोषित लक्ष्य उसके परमाणु कार्यक्रमों को रोकना था, ताकि वह परमाणु हथियारों का निर्माण न कर सके। जबकि ईरान की ऐसी कोई योजना कभी नहीं थी।

इजरायल आज भी ईरान को अपने लिये और दुनिया के लिये खतरा मानने की नीति पर अड़ा हुआ है। उसके प्रधानमंत्री ने कहा है कि ईरान के साथ हुए इस परमाणु समझौते के बाद दुनिया कल के मुकाबले आज ज्यादा खतरनाक जगह बन गई है। उन्होंने कहा कि हम हमेशा अपना बचाव करेंगे, यह समझौता ईरान को सैंकड़ों बिलियन डॉलर का अप्रत्याशित लाभ देगा, जिसका उपयोग वह इजरायल को नष्ट करने के लिये अपनी ताकत को बढ़ाने में करेगा। 

Ankur Vijaivargiya
Senior Correspondent
Hindustan Times Media Limited
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Saturday, April 11, 2015

चीन, चुनौतियां और चिंता


चीन, चुनौतियां और चिंता
देश के अखबारों, पत्रिकाओं और न्यूज चैनलों में चीन की चर्चा तभी होती है जब वो कुछ ऐसा करता है जिसका असर भारत पर पड़ता है. फिलहाल चीन के उस प्रोजेक्ट की चर्चा हो रही है जो सामरिक दृष्टि से भारत के लिए ठीक नहीं है. चीन नेपाल तक रेल लाइन बिछाना चाहता है. तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश तक तो पहले ही रेल सेवा शुरू कर चुका है लेकिन अब दिल्ली के बेहद करीब काठमांडू तक पहुंचना चाहता है. इस रेल लाइन की लंबाई 540 किमी है और 2020 तक पूरा करने का लक्ष्य है. चीन धीरे-धीरे भारत को ऐसे घेर रहा है जैसे कोई बहेलिया अपना शिकार पकड़ने के लिए जाल बिछाता है और मौका मिलते ही झपट्टा मारकर शिकार कर लेता है.
चीन एक तरफ जहां भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है वहीं दलाई लामा से मिलने वाले तिब्बतियों के रास्ते बंद करना चाहता है. चीन की योजना तिब्बत और नेपाल के बीच 540 किमी लंबा रेलमार्ग बनाने की है. रेलमार्ग माउंट एवरेस्ट के नीचे एक सुरंग से होकर गुजरेगा. यही नहीं चीन ने तिब्बती रेल नेटवर्क का विस्तार भूटान और भारत तक करने की घोषणा की है. चीन की ये कोशिश भारत के लिए चिंता का सबब बन सकती है. नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका तक पहुंच बनाने के लिए चीन खूब पैसा बहा रहा है. इन देशों की मदद राशी में कई गुना इजाफा कर रहा है. नेपाल को दी जाने वाली 2.4 करोड़ डॉलर की सालाना मदद को बढ़ाकर 12.8 करोड़ कर दिया है.
चीन बेहद सक्रिय कूटनीति के साथ दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. ताजा उदाहरण अफगान शांति प्रक्रिया में शामिल होने का प्रस्ताव रखना है. बांग्लादेश को जंगी जहाज, पाकिस्तान में बिजली परियोजनाएं स्थापित कर इन दोनों देशों पर अपना एहसान लाद रहा है. भारत से भी वो कुटनीतिक रिश्ते बढ़ा रहा.

पाकिस्तान में चीन और भारत की चिंता
बहुत पहले से चीन पाकिस्तान का साथ देता आ रहा है. आर्थिक, सामरिक, व्यापारिक और ऊर्जा क्षेत्र में पाकिस्तान की मदद करता है. पाकिस्तान की मिसाइल क्षमता बढ़ाने में भी चीन पिछले दरवाजे से मदद कर रहा है. पाकिस्तान भारत के प्रभुत्व को रोकने के लिए स्टेल्थ एयरक्रॉफ्ट खरीदने की योजना पर काम कर रहा है. पाकिस्तान और चीन आर्थिक गलियारे पर भी काम कर रहे हैं. भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता और चुनौतियां ग्वादर बंदरगाह है. पाकिस्तान इसे पश्चिमी चीन से जोड़ने के लिए तैयार भी हो गया है. सामरिक दृष्टि से ग्वादर पोर्ट भारत के लिए चिंता का विषय है क्योंकि चीन यहां से भारत की हर गतिविधि पर नजर रख सकता है और युद्ध के समय इसका इस्तेमाल भी कर सकता है. पाकिस्तान जानता है कि भारत से सीधी लड़ाई नहीं जीत सकता इसलिए वो चीन को अमेरिका से भी ज्यादा अपना करीबी मानता है. चीन भी जानता है कि भारत पर अगर दबाव बनाए रखना है तो पाकिस्तान को अपने साथ रखना होगा और इसलिए चीन पाकिस्तान में पानी की तरह पैसा बहा रहा है.

बांग्लादेश में चीन और भारत की चिंता
भारत जहां पश्चिम में पाकिस्तान से परेशान हैं वहीं पूर्व में बांग्लादेश भी चिंता का सबब बना हुआ है. सिर्फ आतंकी घुसपैठ ही भारत के लिए परेशानी का विषय नहीं है. बांग्लादेश में चीन का बढ़ता प्रभाव भी एक चुनौती है. चीन पैसा, हथियार और पनडुब्बी मुहैया करा रहा है. बंगाल की खाड़ी में तेल पाइपलाइन बिछाने की योजना पर भी काम करने के लिए तैयार है. चीन बंगाल की खाड़ी में समुद्री मार्ग पर अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहता है लेकिन बांग्लादेश के सामने भारत की नाराजगी भी खड़ी है, वहीं दोनों देशों से फायदा भी लेना चाहता है.

श्रीलंका की ओर से भी घेराबंदी कर रहा चीन
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रीलंका दौरे पर गए थे. पीएम मोदी ने श्रीलंका के सामने अपनी चिंताएं रखी. दक्षिणी-पूर्वी श्रीलंका में हंबन्टोटा बंदरगाह निर्माण में चीन की सक्रियता से भारत चिंतित है. पाकिस्तान में ग्वादर और श्रीलंका में हंबन्टोटा में चीन की रूची भारत के लिए ठीक नहीं. चीन तो इसे सामुद्रीक सिल्क रूट के तौर पर बता रहा है लेकिन उसकी मंशा भारत को घेरने की लग रही है. हालांकि पीएम मोदी के दौरे के दौरान श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने भारत की इस चिंता को दूर करने का आश्वासन दिया. सिरीसेना ने भरोसा दिया कि वो भारत के खिलाफ चीन को श्रीलंका की जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देगा.

भारत-चीन संबंध और चुनौतियां
चीन और भारत में विश्वसनियता की कमी है. दोनों देशों के संबंध दिखावटी ज्यादा लगते हैं. भले ही चीन ने मोदी सरकार बनते ही भारत के साथ अच्छे रिश्ते की वकालत की लेकिन उसका मंसूबा ठीक नहीं लगता. एक तरफ तो वो भारत में निवेश बढ़ा कर विश्वास जीतना चाहता है वहीं नेपाल, भूटान, तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के पास तक रेल लाइन बिछा कर भारत को घेर रहा है. साल 2014 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत दौरे पर आए थे. पीएम मोदी ने उन्हें झूला पर बैठाकर आपनापन दिखाया और खूब आवभगत की. दोनों देशों के बीच बारह समझौते हुए. एक समझौते के मुताबित चीन अगले पांच साल में भारत में आधारभूत ढ़ांचे के विकास के लिए 20 अरब डॉलर निवेश करेगा. चीन भले ही भारत के लिए बड़े व्यापारिक सहयोगियों में से एक हो लेकिन दोनों देशों के बीच सीमा विवाद काफी गहरा है. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सितंबर 2014 में जब चीन के राष्ट्रपति भारत में थे और 20 अरब डॉलर निवेश का समझौता कर रहे थे, ठीक उसी समय लद्दाख में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ कर दी. 9 अप्रैल 2015 को चीन ने अपने एक वक्तव्य में कहा कि अरुणाचल प्रदेश में भारत के साथ विवाद एक अकाट्य सत्य है. चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताकर उसपर अपना दावा करता है. अरुणाचल प्रदेश की 1126 किमी सीमा चीन से लगती है. भारत जब भी कोई निर्माण कार्य करता है तो चीन विरोध जताता है. फिलहाल भारत सरकार अरुणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर  में चीन सीमा से सटे चार रेल लाइन बिछाने की योजना पर काम कर रहा है. सर्वे के लिए निर्देश भी दे दिए गए हैं लेकिन चीन इस पर विरोध जता रहा है.

रेल लाइन मिसामारी से तवांग के बीच 378 किलोमीटर लंबी, असम-अरुणाचल प्रदेश, उत्तरी
लखीमपुर से सिलापथर तक 248 किलोमीटर की, असम से अरुणाचल प्रदेश, मुरकोंगसेलेक-पासीघाट-
तेजू-परशुराम कुंड-रुपई के बीच 256 किलोमीटर और हिमाचल प्रदेश-जम्मू एवं कश्मीर, बिलासपुर-
मंडी-मनाली-लेह के बीच 498 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछाने की योजना है. पटरी बिछाने के लिए पहाड़ में कई सुरंगें खोदनी होंगी.

अभी हाल ही में भारत द्वारा चीन की सीमा के पास सड़क बनाने के फैसले का उसने खुलकर विरोध
किया था. इस पर भारत ने अपना रुख साफ करते हुए कहा था कि भारत को अपनी जमीन पर काम करने के लिए किसी से पूछने की जरूरत नहीं है. उधर, भारत से सटी सीमा के नजदीक चीन ने सड़कों और रेल ट्रैक पहले ही जाल बिछा दिया है. अब भारत के सामने चुनौतियां ये हैं कि वो चीन के विरोध से कैसे निपटता है और चिंता ये है कि अगर चीन अड़ गया तो भारत क्या कदम उठाएगा. चिंता ये भी है कि अगर चीन नेपाल तक रेल लाइन बिछा लेता है तो भारत के पास उसक काट क्या है? भारत को इन्हीं चुनौतियों और चिंताओं से लड़ना है. चीन के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए भारत को भी पूरी तैयारी करनी होगी. हालांकि पीएम मोदी इस चिंता से अवगत हैं इसलिए वो भारत की रक्षा प्रणाली को मजबूत करने में जुटे हैं. फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका के साथ रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कवायद करना इसका संकेत है.

Sunday, March 29, 2015

शब्दों का व्यापारी हूं शब्द ले लो

शब्दों का व्यापारी हूं शब्द ले लो
गीत का, प्रित का, मित का
क्रोध का, काम का, घृणा का शब्द बेचता हूं ले लो
शब्दों का व्यापारी हूं शब्द ले लो
हंसने का, हंसाने का
रोने और रुलाने का शब्द बेचता हूं ले लो
तंत्र का, मंत्र का, यंत्र का
गणतंत्र का और लोकतंत्र का शब्द बेचता हूं ले लो
गाली का, मवाली का
ठगी का, नेकी और बदी का शब्द बेचता हूं ले लो
झूठ का, सच का
इंसानियत का, हैवानियत का शब्द बेचता हूं ले लो
घात का, विश्वास का
कलह का, सुलह का शब्द बेचता हूं ले लो
टीश का, टशन का
खुशी और जलन का शब्द बेचता हूं ले लो
शब्दों का व्यापारी हूं शब्द ले लो
सुनो! ये शब्द हैं तो तुम हो
तेरे आंसू है, तेरी हंसी है
तेरी खुशी है, उदासी है
जिंदगी है और जज्बात हैं
नाम है, पहचान है
प्रवचन है, प्रणाम है
कॉपी है, किताब है
कविता है, उपन्यास है
गीत है, आवाज है
शब्द है तो साज है
फिर कहता हूं ले लो
शब्दों का व्यापारी हूं शब्द ले लो


Friday, September 26, 2014

मुझे क्या?

पीएम ने 15 अगस्त को कहा था अब फिर 2 अक्टूबर को वहीं अपील करने जा रहे हैं. कुछ तो साफ सुथरा रहो भाई? पड़ोसी का नहीं अपना घर तो कम से कम साफ रखो. पीएम तो खुद झाड़ू उठाने को तैयार हैं, आप कब उठाएंगे. सीमा पर मरने की बात मत सोचो, घर में जीने का जुगाड़ करो. सीमा तो सेना संभाल रही है कम से कम घर तो आप संभाल लो. यही बात पीएम हम सबसे कह रहे हैं. याद है मुझे, शायद आपको भी याद होगा 15 अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की जनता से दिल की बात कर रहे थे. मोदी अर्थव्यस्था के आंकड़ों का जिक्र नहीं कर रहे थे. मेरा क्या? मुझे क्या? विकास, बलात्कार, भ्रष्टाचार, रहन-सहन, साफ-सफाई, भ्रूण हत्या का जिक्र कर रहे थे. उनकी बातों में जनता से एक अपील थी. हम नहीं सुधरेंगे तो कुछ नहीं सुधरेगा की बात कर रहे थे. पीएम मोदी का भाषण बहुत भावुक और जोशिला था. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पीएम मोदी करीब सवा घंटे तक देश की जनता से अपील करते रहे. मैं भी दफ्तर में पीएम का भाषण बड़ी गौर से सुन रहा था. ऐसा लग रहा था कि पीएम के इस जोरदार भाषण का असर जनता पर जरूर होगा. लेकिन जैसे भी पीएम का भाषण खत्म हुआ और लोग लालकिले के परिसर से अपने घर लौटने लगे तो जो तस्वीर हमारे सामने आई उससे मुझे काफी पीड़ा हुई. तस्वीर देखकर मुझे पीएम के भाषण का वो हिस्सा याद आया जिसमें वो मेरा क्या, मुझे क्या?’ का जिक्र कर रहे थे. यह तसवीर है, पीएम के भाषण के बाद लालक़िले के मैदान की. मोदी ने कितनी ज़ोरदार अपील की थी सफ़ाई रखने की और देखिए पीएम के भाषण पर तालियां बजाने वालों ने कैसे एक कान से सुन कर उसे दूसरे कान से निकाल दिया.

अब सवाल ये है कि क्या पीएम मोदी ने मेरा क्या, मुझे क्या?’ सिर्फ भ्रष्टाचार के संदर्भ में कहा था? जनता की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? आखिर कब तक मुझे क्यासफाई तो सरकार का काम है, कहकर अपनी जिम्मेदारी से हम भागते रहेंगे?   
प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत गहरी बात की थी और देश की बहुत सारी समस्याओं की जड़ भी यही है. मोदी का संदेश था कि देश नेताओं, सरकारों से नहीं जनता से बनता है. जनता सुधरेगी तो देश आगे बढ़ेगा. जनता साफ-सफाई रखेगी तो देश चमकेगा. अगर सरकारें साफ-सफाई करवा भी दें तो क्या फर्क पड़ेगा जब तक हम पान, गुटखा खा कर थूकना और सड़कों पर कचरे डालना बंद नहीं करेंगे? क्या देश बनाने में जनता की भागीदारी नहीं होनी चाहिए? क्या मेरा क्या, मुझे क्या?’ से आगे बढ़कर साफ-सफाई अपना कर्तव्य मानकर हम ये काम नहीं कर सकते? मोदी तो सिर्फ थोड़ा सहयोग चाहते हैं. मोदी ने बिल्कुल सही बात कही देश बनाना है तो जनता भी कुछ करे! अगर देश का हर नागरिक एक-एक क़दम उठाये तो सवा अरब क़दम उठ जायेंगे!मोदी की बात में दम भी है. जनता ख़ुद को बदलना न चाहे और देश को बदलने का सपना देखे तो वह भला कैसे पूरा हो सकता है?
 मोदी का सवाल सीधा और बड़ा है. बलात्कार के खिलाफ आवाज उठाना, भ्रूण हत्याएं रोकना, साफ़-सफ़ाई रखाने के प्रति जागरूकता  क्या देश के नागरिकों की ज़िम्मेदारी नहीं? हैरानी की बात ये है कि लोगों ने मोदी का भाषण बड़े उत्साह से सुना. हर अच्छी बात पर तालियां भी बजाई. लेकिन भाषण खत्म होने के बाद लोग वहां से जाने लगे तो लालकिले के परिसर में पानी की खाली बोतलें, चिप्स के खाली पैकेट्स, केले के छिलके छोड़कर चलते बने. आखिर में लोग प्रधानमंत्री की अपील को अनसुना क्यों कर दिए? लोगों ने दस मिनट में ही सबकुछ क्यों भूला दिया? क्या जनता का काम सिर्फ सरकार पर सवाल उठाना होता है या कुछ सवालों का जवाब भी देना होता है? अगर ऐसे ही रहना है तो सरकारों को गलत ठहराना बंद होना चाहिए. पीएम की इतनी बड़ी बात लोगों को दस मिनट भी याद नहीं , साफ़-सफ़ाई रखने की बेहद मामूली-सी बात भी लोग मान नहीं सके, तो बलात्कार और भ्रूण हत्याओं जैसे मुद्दों पर वे किसी की क्या सुनेंगे? लोगों को करना क्या था? किसी की जेब से कुछ जाना नहीं था. अपना कचरा ख़ुद समेट लेते, रास्ते में कहीं न कहीं कोई डस्टबिन दिखता, उसमें फेंक देते और घर चले जाते, लेकिन नहीं. शायद लोग इस भरोसे अपनी गंदगी छोड़ गए कि कचरा साफ़ करने वाला कोई होगा, वह करेगा, मुझे क्या? मोदी ने भी अपने भाषण में यही सवाल उठाया था कि सरकारी कर्मचारी कहता है, मेरा क्या, मुझे क्या? तो सिर्फ़ सरकारी कर्मचारी ही नहीं, यहां तो हर कोई कहता है मुझे क्या? अगर जनता भी सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों की तरह मेरा क्या, मुझे क्या?’ से बाहर नहीं निकली तो इस देश का कुछ नहीं हो सकता चाहे मोदी हजारों बार लालकिले से अपील करें. गांधी जी के बाद कई लोगों ने समाज की गंदगी साफ करने की कोशिश की. थोड़ी बहुत कामयाबी तो मिली लेकिन वो कामयाबी काफी नहीं है. अब मोदी समाज की गंदगी साफ करना चाहते हैं क्या आप सभी इस अभियान में शामिल नहीं होंगे? भले ही कुछ लोग मोदी को पसंद ना करता हो लेकिन अपनी सेहत के लिए साफ-सफाई रखने में क्या हर्ज है? ‘मेरा क्या, मुझे क्या?’ से निकलकर देश के लिए काम करने में क्या हर्ज है?