Thursday, July 10, 2014

चिल्ल पों मचाने से काम नहीं चलेगा...

चकरोड से गुजरते हुए हरिकांत की मां कहती थीं 'हमरिओ घरवा तनी लौकिया और कोहडवा भेजवा देतअ'. ललूआ की मां कहती थीं 'तनी टमाटर और घेंवडवा दे देतअ एक बेरा के काम चल जाइत'... दादी कहती था 'तनी प्याज, दाल, कोहड़ा और लौकी अपनी बुआ के घर दे आव...का होई.. इतना तो बहुत बा'... ये उन दिनों की बात है जब मैं गांव में रहता था. मां गऊशाला के छप्पर पर, नीम के पेड़ पर और चकरोड के किनारे घिया, कद्दू, नेनुआ के बीज बो देती थीं. देखते-देखते जमीन से लेकर नीम के पेड़ तक हरी सब्जियां फलने लगती थीं. हम सभी भाई मिलकर आलू, प्याज, टमाटर, मूली, गोभी, भिंडी, पालक की पर्यापत मात्रा में खेती कर लेते थे. हम लोग तो खाते ही थे आस पड़ोस में भी बांट दिया जाता था. रिश्तेदारों के यहां भी भिजवा दिया जाता था. उस समय हमारे यहां कोई ट्रैक्टर नहीं था. बैल से खेती होती थी. बड़े पिताजी के लड़के विजयी भाई हल चलाना जानते थे. धीरे-धीरे मैंने भी सीख लिया था. सुबह होते ही विजयी भाई, मैं और मेरे बड़े भाई हल और बैल लेकर खेत में चले जाते. सुबह आठ बजे तक हल से खेत की जुताई करते थे, फिर दादाजी के आने के बाद हम लोग पढ़ने के लिए भाग जाते. शाम को स्कूल से लौटकर फिर खेतों में जुट जाते. गाय-भैंस को खिलाने-पिलाने के बाद पढ़ाई होती थी. मैं पढ़ने में काफी लापरवाह था. मेरे बड़े भाई घर का काम करने के बाद भी वो मन लगा कर पढ़ते थे. हम लोग सब्जियों की खेती करने में काफी रूचि रखते थे. घर के आस पास फूल भी लगाते थे. मां, दादी, बुआ के हाथों लगी सब्जियां काफी फलती थीं. लोग कहते थे कि तुम्हारी मां, बड़ी वाली बुआ के हाथ में जादू है क्या? कोई भी सब्जी लगा देती हैं बरकत ही होता है.

लेकिन आज देखिए वही खेत, वही गांव, सबकुछ वही है, अगर कुछ बदला है तो लोगों की सोच, बाजार पर निर्भरता, ट्रैक्टर, ट्यूबेल होने के बावजूद एक जून की सब्जी भी उगाने में नानी याद आ जाती है. फालतू के तर्क और दिखावे के बुशर्ट पहनकर गांव में घुमते मिलते हैं नौजवान. घर का मालिक अगर कोई काम कह दे तो घर के नौजवान तपाक से जवाब देते हैं 'मैं यही काम करूंगा, पैसा है तो जाइए बाजार से खरीद लाइए'... घर के गार्जियन क्या करें. हां कुछ लोग अब भी है जो खेती-बाड़ी को जिंदा रखे हुए हैं. मेहनत करके कम से कम अपने लिए अनाज और सब्जियां तो उगा ही लेते हैं...

ये बातें मुझे इसलिए याद करनी पड़ी क्योंकि, महंगाई को लेकर खूब चिल्ल-पों हो रही है. सब बजारू हो गए हैं. कोई भी सरकार हो, उसको गाली देना फैशन बन गया है. सरकार भी अनाज, सब्जियों के पैदावार से ज्यादा जोर मीडिया मैनेजमेंट पर जोर दे रही है. लोग भी इतने काहिल हो चुके हैं कि खुद कुछ करना नहीं चाहते और दूसरों पर दोष मढ़ते जा रहे हैं. शहर तो बाजार पर ही निर्भर है लेकिन अब गांव भी बाजार के भरोसे जीने लगा है. लोग सब्जियां पैदा करने के वजाय बाजार से खरीदना ज्यादा उचित समझते हैं. क्योंकि इसके पीछे तर्क देते हैं कि जितनी लागत में सब्जियां ऊगाओ उतने में बाजार से सब्जियां मिल जाती हैं. लेकिन ये नहीं सोचते कि यदि बाजार पर इस तरह से निर्भर रहेंगे तो बाजार ब्लैकमेल करने लगेगा. अगर लागत के बराबर भी उपज हो रही है तो क्या हर्ज है? कम से कम ताजी-सब्जियां तो मिल रही हैं. बाजार में मांग नहीं बढ़ेगी. और जब मांग नहीं बढ़ेंगी तो महंगाई कहां से बढ़ेगी?

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