Saturday, April 11, 2015

चीन, चुनौतियां और चिंता


चीन, चुनौतियां और चिंता
देश के अखबारों, पत्रिकाओं और न्यूज चैनलों में चीन की चर्चा तभी होती है जब वो कुछ ऐसा करता है जिसका असर भारत पर पड़ता है. फिलहाल चीन के उस प्रोजेक्ट की चर्चा हो रही है जो सामरिक दृष्टि से भारत के लिए ठीक नहीं है. चीन नेपाल तक रेल लाइन बिछाना चाहता है. तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश तक तो पहले ही रेल सेवा शुरू कर चुका है लेकिन अब दिल्ली के बेहद करीब काठमांडू तक पहुंचना चाहता है. इस रेल लाइन की लंबाई 540 किमी है और 2020 तक पूरा करने का लक्ष्य है. चीन धीरे-धीरे भारत को ऐसे घेर रहा है जैसे कोई बहेलिया अपना शिकार पकड़ने के लिए जाल बिछाता है और मौका मिलते ही झपट्टा मारकर शिकार कर लेता है.
चीन एक तरफ जहां भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है वहीं दलाई लामा से मिलने वाले तिब्बतियों के रास्ते बंद करना चाहता है. चीन की योजना तिब्बत और नेपाल के बीच 540 किमी लंबा रेलमार्ग बनाने की है. रेलमार्ग माउंट एवरेस्ट के नीचे एक सुरंग से होकर गुजरेगा. यही नहीं चीन ने तिब्बती रेल नेटवर्क का विस्तार भूटान और भारत तक करने की घोषणा की है. चीन की ये कोशिश भारत के लिए चिंता का सबब बन सकती है. नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका तक पहुंच बनाने के लिए चीन खूब पैसा बहा रहा है. इन देशों की मदद राशी में कई गुना इजाफा कर रहा है. नेपाल को दी जाने वाली 2.4 करोड़ डॉलर की सालाना मदद को बढ़ाकर 12.8 करोड़ कर दिया है.
चीन बेहद सक्रिय कूटनीति के साथ दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. ताजा उदाहरण अफगान शांति प्रक्रिया में शामिल होने का प्रस्ताव रखना है. बांग्लादेश को जंगी जहाज, पाकिस्तान में बिजली परियोजनाएं स्थापित कर इन दोनों देशों पर अपना एहसान लाद रहा है. भारत से भी वो कुटनीतिक रिश्ते बढ़ा रहा.

पाकिस्तान में चीन और भारत की चिंता
बहुत पहले से चीन पाकिस्तान का साथ देता आ रहा है. आर्थिक, सामरिक, व्यापारिक और ऊर्जा क्षेत्र में पाकिस्तान की मदद करता है. पाकिस्तान की मिसाइल क्षमता बढ़ाने में भी चीन पिछले दरवाजे से मदद कर रहा है. पाकिस्तान भारत के प्रभुत्व को रोकने के लिए स्टेल्थ एयरक्रॉफ्ट खरीदने की योजना पर काम कर रहा है. पाकिस्तान और चीन आर्थिक गलियारे पर भी काम कर रहे हैं. भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता और चुनौतियां ग्वादर बंदरगाह है. पाकिस्तान इसे पश्चिमी चीन से जोड़ने के लिए तैयार भी हो गया है. सामरिक दृष्टि से ग्वादर पोर्ट भारत के लिए चिंता का विषय है क्योंकि चीन यहां से भारत की हर गतिविधि पर नजर रख सकता है और युद्ध के समय इसका इस्तेमाल भी कर सकता है. पाकिस्तान जानता है कि भारत से सीधी लड़ाई नहीं जीत सकता इसलिए वो चीन को अमेरिका से भी ज्यादा अपना करीबी मानता है. चीन भी जानता है कि भारत पर अगर दबाव बनाए रखना है तो पाकिस्तान को अपने साथ रखना होगा और इसलिए चीन पाकिस्तान में पानी की तरह पैसा बहा रहा है.

बांग्लादेश में चीन और भारत की चिंता
भारत जहां पश्चिम में पाकिस्तान से परेशान हैं वहीं पूर्व में बांग्लादेश भी चिंता का सबब बना हुआ है. सिर्फ आतंकी घुसपैठ ही भारत के लिए परेशानी का विषय नहीं है. बांग्लादेश में चीन का बढ़ता प्रभाव भी एक चुनौती है. चीन पैसा, हथियार और पनडुब्बी मुहैया करा रहा है. बंगाल की खाड़ी में तेल पाइपलाइन बिछाने की योजना पर भी काम करने के लिए तैयार है. चीन बंगाल की खाड़ी में समुद्री मार्ग पर अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहता है लेकिन बांग्लादेश के सामने भारत की नाराजगी भी खड़ी है, वहीं दोनों देशों से फायदा भी लेना चाहता है.

श्रीलंका की ओर से भी घेराबंदी कर रहा चीन
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रीलंका दौरे पर गए थे. पीएम मोदी ने श्रीलंका के सामने अपनी चिंताएं रखी. दक्षिणी-पूर्वी श्रीलंका में हंबन्टोटा बंदरगाह निर्माण में चीन की सक्रियता से भारत चिंतित है. पाकिस्तान में ग्वादर और श्रीलंका में हंबन्टोटा में चीन की रूची भारत के लिए ठीक नहीं. चीन तो इसे सामुद्रीक सिल्क रूट के तौर पर बता रहा है लेकिन उसकी मंशा भारत को घेरने की लग रही है. हालांकि पीएम मोदी के दौरे के दौरान श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने भारत की इस चिंता को दूर करने का आश्वासन दिया. सिरीसेना ने भरोसा दिया कि वो भारत के खिलाफ चीन को श्रीलंका की जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देगा.

भारत-चीन संबंध और चुनौतियां
चीन और भारत में विश्वसनियता की कमी है. दोनों देशों के संबंध दिखावटी ज्यादा लगते हैं. भले ही चीन ने मोदी सरकार बनते ही भारत के साथ अच्छे रिश्ते की वकालत की लेकिन उसका मंसूबा ठीक नहीं लगता. एक तरफ तो वो भारत में निवेश बढ़ा कर विश्वास जीतना चाहता है वहीं नेपाल, भूटान, तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के पास तक रेल लाइन बिछा कर भारत को घेर रहा है. साल 2014 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत दौरे पर आए थे. पीएम मोदी ने उन्हें झूला पर बैठाकर आपनापन दिखाया और खूब आवभगत की. दोनों देशों के बीच बारह समझौते हुए. एक समझौते के मुताबित चीन अगले पांच साल में भारत में आधारभूत ढ़ांचे के विकास के लिए 20 अरब डॉलर निवेश करेगा. चीन भले ही भारत के लिए बड़े व्यापारिक सहयोगियों में से एक हो लेकिन दोनों देशों के बीच सीमा विवाद काफी गहरा है. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सितंबर 2014 में जब चीन के राष्ट्रपति भारत में थे और 20 अरब डॉलर निवेश का समझौता कर रहे थे, ठीक उसी समय लद्दाख में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ कर दी. 9 अप्रैल 2015 को चीन ने अपने एक वक्तव्य में कहा कि अरुणाचल प्रदेश में भारत के साथ विवाद एक अकाट्य सत्य है. चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताकर उसपर अपना दावा करता है. अरुणाचल प्रदेश की 1126 किमी सीमा चीन से लगती है. भारत जब भी कोई निर्माण कार्य करता है तो चीन विरोध जताता है. फिलहाल भारत सरकार अरुणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर  में चीन सीमा से सटे चार रेल लाइन बिछाने की योजना पर काम कर रहा है. सर्वे के लिए निर्देश भी दे दिए गए हैं लेकिन चीन इस पर विरोध जता रहा है.

रेल लाइन मिसामारी से तवांग के बीच 378 किलोमीटर लंबी, असम-अरुणाचल प्रदेश, उत्तरी
लखीमपुर से सिलापथर तक 248 किलोमीटर की, असम से अरुणाचल प्रदेश, मुरकोंगसेलेक-पासीघाट-
तेजू-परशुराम कुंड-रुपई के बीच 256 किलोमीटर और हिमाचल प्रदेश-जम्मू एवं कश्मीर, बिलासपुर-
मंडी-मनाली-लेह के बीच 498 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछाने की योजना है. पटरी बिछाने के लिए पहाड़ में कई सुरंगें खोदनी होंगी.

अभी हाल ही में भारत द्वारा चीन की सीमा के पास सड़क बनाने के फैसले का उसने खुलकर विरोध
किया था. इस पर भारत ने अपना रुख साफ करते हुए कहा था कि भारत को अपनी जमीन पर काम करने के लिए किसी से पूछने की जरूरत नहीं है. उधर, भारत से सटी सीमा के नजदीक चीन ने सड़कों और रेल ट्रैक पहले ही जाल बिछा दिया है. अब भारत के सामने चुनौतियां ये हैं कि वो चीन के विरोध से कैसे निपटता है और चिंता ये है कि अगर चीन अड़ गया तो भारत क्या कदम उठाएगा. चिंता ये भी है कि अगर चीन नेपाल तक रेल लाइन बिछा लेता है तो भारत के पास उसक काट क्या है? भारत को इन्हीं चुनौतियों और चिंताओं से लड़ना है. चीन के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए भारत को भी पूरी तैयारी करनी होगी. हालांकि पीएम मोदी इस चिंता से अवगत हैं इसलिए वो भारत की रक्षा प्रणाली को मजबूत करने में जुटे हैं. फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका के साथ रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कवायद करना इसका संकेत है.