Friday, July 25, 2014

हिंदी की हत्या मत कीजिए, पीड़ा तो समझिए...

पीएम मोदी से पूछिए उनका दर्द, जब वो श्रीहरिकोट गए थे तो क्या हुआ? पीएम के दर्द को जीतना मैं समझ सका आपको बता रहा हूं. पीएम पीएसएलबी की उड़ान के बाद वैज्ञानिकों को संबोधित कर रहे थे. अंग्रेजी में महारथ हासिल होती तो टेलीप्रॉम्पटर की जरूरत नहीं पड़ती. हालांकि अंग्रेजी जानने वाली भी टेलीप्रॉम्पटर लगाते हैं. लेकिन मोदी को बेहतर अंग्रेजी आती तो उसकी जरूरत नहीं पड़ती. टेलीप्रॉम्पटर देखकर अंग्रेजी में भाषण दे रहे थे. जब लड़खड़ा रहे थे तो हिंदी का इस्तेमाल कर रहे थे. उन्हें भी अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि जीतनी अच्छी हिंदी में बात कर लेते हैं उतनी अच्छी अंग्रेजी में नहीं. अंग्रेजी बोलना मजबूरी थी क्योंकि मौजूद कई वैज्ञानिकों को हिंदी नहीं आती थी. दूसरी ओर दुनिया को भी दिखाना था कि भारत के पीएम का विजन क्या है?

पीएम की बात छोड़िए खुद की बात करते हैं. विश्वास ना हो तो मार्कण्डेय सर से पूछ लीजिएगा. यूपी के देवरिया जिले में डूमरी के रहने वाले हैं. हमारे गांव पिंडी में ट्यूशन पढ़ाने आते हैं. अग्रेजी को हिंदी और हिंदी को अंग्रेजी में अनुवाद करके समझाते थे. इंटरमीडिएट की अंग्रेजी तो उन्हीं से पढ़ी. शुरू में तो पल्ले नहीं पड़ती थी. लेकिन मार्कण्डेय सर तो उस्ताद थे. पहले तो अंग्रेजी को अंग्रेजी में समझाने की कोशिश की लेकिन भोजपुरी बोलने वाला बालक सीधे अंग्रेजी को अंग्रेजी में कैसे समझ सकता था? फिर उन्होंने अंग्रेजी की कविताओं और कहानियों को हिंदी में अनुवाद करना शुरू किया और रट्टामार  ज्ञान अर्जन की पद्धति से अंग्रेजी को हिंदी में समझाने लगे. धीरे-धीरे अंग्रेजी की दो-चार लाइने समझ में आने लगी. काफी मेहनत के बाद अंग्रेजी कुछ-कुछ समझ में आने लगी थी. मार्कण्डेय सर ने इतना मेहनत किया कि इंटरमीडिएट में अंग्रेजी विषय में पास करने में कोई कठिनाई नहीं हुई. रट्टामार के ही सही अंग्रेजी विषय में सिर्फ पास कर लिया. आगे भी अंग्रेजी की पढ़ाई करना चाहता था लेकिन उस समय की सोच के हिसाब से मुझे संभव नहीं लगा. मैं सोचता था कि इंटरमीडिएट की अंग्रेजी समझने के लिए इतना मेहनत करना पड़ा तो आगे क्या-क्या करना होगा? आप कह सकते हैं कि उस समय मेरी हिम्मत जवाब दे गई थी. जितना समय मैं अंग्रेजी के लिए देता था उसके दसवां हिस्सा भी किसी अन्य विषय के लिए नहीं दे पाता था.

दसवीं की पढ़ाई मैंने मामा के घर रह कर की. मोहम्मद युसूफ से अंग्रेजी का ट्यूशन लिया. शिवेश मामा भी कभी-कभी अंग्रेजी पढ़ाया करते थे. दसवीं में मैं गणित में तेज था लेकिन अंग्रेजी काफी खराब थी.

छवीं से आठवीं कक्षा तक डूमरी के ही तिवारी सर अंग्रेजी को रस में घोलकर पिलाते थे. गाना गाकर, कविताएं सुनाकर प्रेरित करते थे. कभी-कभी इंग्लैंड, अमेरिका की बात भी सुनाते थे. दो-चार लाइन अंग्रेजी बोलते थे तो सुनकर काफी अच्छा लगता था.

हम लोग भी अंग्रेजी बोलने की कोशिश करते थे लेकिन हमारी अंग्रेजी काफी मारक होती थी. जैसे- 'मारन टू लाठी, फोरन टू कपार...ओही पड़े जाइव पिंडी बाजार...' रजिया इज गोइंग टू कानपुर, आइ एम गोइंग टू आगरा. बस इतनी सी अंग्रेजी काफी लगती थी. तिवारी सर अंग्रेजी घोल-घोल कर पिलाते रहे. गीत गाकर सुनाते थे 'दही के नदिया के तेहूं किकोर दे... माई रे हमरा के रस तनी घोर दे...' इसी रस में अंग्रेजी घोलकर पिलाते थे.  लेकिन उन्हें क्या पता था कि अंग्रेजी रस में घोलकर नहीं पिलाई जाती, उसे तो सीखना होता है और सीखने के लिए माहौल चाहिए, जो हमारे गांव, स्कूल और घर में नहीं था. 24 घंटे भोजपुरी बोली जाती थी. अगर हम लोग स्कूल में A for Apple रट कर जाते थे तो घर पर क से कुदाल और कबड्डी, ख से खरबुजा और खरगोश, ग से गेना (फुटबॉल) ही समझते थे क्योंकि स्थानीय, सामाजिक और जरूरत का माहौल कुछ ऐसा ही था. अधिकांश घरों में सुबह उठते ही घर और खेती के काम में आंशिक रूप से ही सही हाथ बंटाना होता था. गांवों में सबकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती कि नौकर रखकर काम कराए और बच्चों को पढ़ने के लिए गांव से दूर शहर में भेजे. बच्चे क्या करते, अपने ही माहौल में लड़-झगड़ कर आगे बढ़ते थे. कोई बाहर चला गया तो अच्छा नहीं तो गांव के गोंइडे के स्कूल में पढ़ाई हो जाती थी. मास्टर साहब का मन हुआ तो पढ़ा देते थे नहीं तो सुर्ती बनाते रहते थे.

समस्या सिर्फ यही नहीं थी. पांचवी तक अंग्रेजी का दर्शन नहीं हुआ. छठी क्लास से अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू हुई.  A B C D E F G H रटते हुए स्कूल से घर की ओर भागते थे. एक हाथ से सरकते पैंट और दूसरे हाथ से बस्ता (स्कूल बैग) के साथ बैठने के लिए बोरा संभालते हुए घर के लिए चल पड़ते थे. A B C D, वन, टू, थ्री, फोर और एक ईकाई, दो ईकाई, तीन ईकाई... दो का दो, दो दूनी चार, दो चौके आठ के बीच के समझ को भी समझाने वाला कोई नहीं था. बस रट्टा मार लेते थे. सर जी पूछते थे तो शुरू हो जाते थे. 15 तक पहाड़ा, वन टू और गिनती सुनाने पर शाबाशी मिलती थी और इतना ही जानकर हम लोग तीसमार खान बनते थे. कोई समझाने वाला नहीं था. कोई ये बताने वाला नहीं था कि क्या पढ़ें या क्या ना पढ़ें?

ऐसी स्थिति सिर्फ मेरी नहीं थी. देश के 60% से ज्यादा लोगों की कहानी यही है. चाहें वो हिंदी भाषी हों या मराठी या बंगाली या अन्य भाषाई हों. सबके पास इतनी सुविधा नहीं है कि अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ सकें. अपनी भाषा में ही रास्ते बनाने होंगे. हर व्यक्ति चाहता है कि वो अंग्रेजी, चीनी या रूसी पढ़े लेकिन ये नहीं चाहता कि ये भाषाएं उन पर थोपीं जाएं. अंग्रेजी की वहज से अपनी ही भाषा के प्रति हीनता मन को पीड़ा पहुंचाती है.

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (भोपाल) ने मुझे अंग्रेजी समझाया. 2005 तक पोस्ट ग्रेजुएट बन चुका था. 2006-08 तक भोपाल में रह कर पढ़ाई की. दिनकर सर अनुवाद पढ़ाने के लिए आते थे. काफी बारिकी से अंग्रेजी समझाया करते थे. सुलझे हुए वरिष्ठ पत्रकार हैं. जो कुछ भी अंग्रेजी की समझ मुझमें है वो दिनकर सर की वजह से है. अब भी मैं इसमें पारंगत नहीं हूं लेकिन काम भर का जानता हूं. धीरे-धीरे इसकी समझ बढ़ती जा रही है लेकिन बोल नहीं पाता हूं. जितना जानता हूं उसी के बल पर टीवी मीडिया में कायम हूं. आगे भी कोशिश होगी कि अंग्रेजी को और बेहतर करूं क्योंकि ये हमारी जरूरत है, मजबूरी नहीं.

भारतेंदु हरिशचंद्र ने कहा था 'अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन... पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन...निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल'. इन पंक्तियों में उन लोगों की पीड़ा छिपी है जो दिल्ली में यूपीएससी से सी-सैट हटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. सरकार से अपील है कि भारतीय भाषाओं की हत्या ना करे, संजीवनी दे ताकि 'भारत' बचा रहे.

Saturday, July 19, 2014

'राजा पाकिस्तानी'

जनाब कभी मिलें तो परिवार नियोजन की बात मत करिएगा. भूल कर भी 'हम दो, हमारे दो' का पाठ मत पढ़ाईएगा. महंगाई से बिल्कुल अछूते हैं. अगर 'मिया बीवी टिप-टॉप, दो के बाद फुल स्टॉप' की बात की तो जनाब आपको दुनिया के सबसे आश्चर्यजनक जानवर के रूप में देखेंगे. ये 3 पानी पिलाने वालों के साथ 3 क्रिकेट टीम तैयार कर लिए हैं. दर्शक खोजने की भी जरूरत नहीं पड़ती है. सचमुच ये पुरुष नहीं, महापुरूष हैं. घर के मैनेजमेंट, पत्नियों में और पत्नियों के साथ तारतम्यता मिलाकर चलने की अद्भूत कला सीखनी है तो 'राजा पाकिस्तानी' से जरूर मीलिए. अद्भूत प्रतिभा के खिलाड़ी हैं. जिंदगी को जिंदादिली से जीते हैं. 17 साल की उम्र में जिंदगी की पिच पर उतरे और 54 साल के होने का बावजूद क्रीज पर टिके हुए हैं. इन वर्षों में काफी उम्दा पारी खेली. जितना आप सोच नहीं सकते उससे आगे के खिलाड़ी हैं. सचिन, शिखर और विराट क्या शतक लगाएंगे. इनके आगे तो सब फेल हैं, ओसामा भी.

'एक लाख पूत, सवा लाख नाती', हमारे गांव में दशानन (रावण) के परिवार के बारे में कुछ ऐसा ही कहा जाता है. दशानन के परिवार के बारे में रामायण और कहानियों में ही जिक्र मिलता है. लेकिन 'राजा पाकिस्तानी' का दर्शन तो साक्षात कर सकते हैं. आज कल काफी परेशान चल रहे हैं. ठीक वैसे जैसे 'राजा हिंदुस्तानी' अपनी प्रेमिका से अलग होकर था. 'राजा हिंदुस्तानी' की तरह 'राजा पाकिस्तानी' अपने मन के राजा है. जो चाहें वो करें उनकी मर्जी.

फिलहाल उनकी मर्जी पर काले बादल मंडरा रहे हैं. काफी मायूस हैं. भारत की तरह उनके घर में भी आंदोलन शुरू हो गया है. पत्नियों ने उनकी मांगों को खारिज करते हुए उनका बहिष्कार कर दिया है. पत्नियों के बहिष्कार और पाकिस्तानी सेना के ऑपरेशन से इनके एक और हसीन सपने पर पानी फिर गया है. वैसे ही जैसे हमारे गांव के पती बाबा के. पाकिस्तान की सेना ने उनका सपना चकनाचूर कर दिया. सपना शादी करने का, सपना चौथी बीवी लाने का.

पाकिस्तान के 'राजा पाकिस्तानी' (गुलजार खान) 36 बच्चों के बाप हैं और इस समय सेना से खफा हैं.  पाकिस्तानी सेना ने तालिबान के खिलाफ जो अभियान छेड़ा है, उसने उत्तरी वजीरिस्तान के हजारों लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है. 54 साल के गुलजार खान इनमें से एक हैं. अपना 35 कमरे का घर छोड़ कर परिवार के 100 से ज्यादा सदस्यों के साथ वह नए घर की तलाश में निकल पड़े हैं, अच्छे दिनों के इंतजार में भटक रहे हैं, जाहिर है इतने बड़े परिवार के साथ किसी एक जगह से दूसरी जगह जाकर दोबारा घर बसाना आसान नहीं. इसमें काफी खर्च है. मुर्झाए चेहरे के साथ गुलजार खान को अपनी चौथी शादी के लिए बचाए पैसे खर्च करने पड़ गए. चौथी शादी के पैसे खर्च होने के बाद गुलजार खान काफी नाराज चल रहे हैं. गुस्से में कहते हैं "मैंने जितना पैसा बचाया था सब शावा से बन्नु आने में खर्च हो गया. अब मैं एक बार फिर पैसे जुटाने में जुटा हूं और इंतजार कर रहा हूं कि सेना का यह ऑपरेशन पूरा हो."

उनकी मजबूरी कोई नहीं समझ रहा है. चौथी शादी करना उनकी मजबूरी है. हर पत्नी से उन्हें एक एक दर्जन बच्चे हो चुके हैं और अब वे और बच्चों के लिए राजी नहीं हैं, इसलिए उन्हें चौथी शादी का फैसला करना पड़ा. उनकी बीवियों ने तो उनका बहिष्कार कर दिया है. कहती हैं और बच्चे नहीं करेंगी. गुलजार का दर्द तो समझिए, कहते हैं  'बीवियां तो मुझे अपने करीब भी नहीं आने देतीं. मेरे भी तो कुछ अरमान हैं.'

'राजा पाकिस्तानी' 17 साल के थे जब उनकी पहली शादी हुई. घर वालों ने 14 साल की दूर की बहन से रिश्ता कराया. पहली पत्नी से उन्हें आठ बेटियां और चार बेटे हुए. इस शादी के आठ साल बाद उनकी दूसरी शादी 17 साल की लड़की से हुई. बड़ी खुशी से गुलजार अपनी दूसरी शादी की बात बतातें हैं. "मैं संतुष्ट नहीं था. मुझे और जरूरत थी, मेरा मतलब निजी पलों से है. मैं धोखा देने और गलत काम करने में विश्वास नहीं करता. इसलिए अपनी जरूरतें भी मैंने शादी के कानून के अंदर रह कर ही पूरी की हैं."

तीसरा शादी की कहानी सुनिए. तीसरी शादी अपने भाई की बेवा के साथ की. भाई की शादी के एक महीने बाद ही मौत हो गयी थी.  पेशे से ड्राइवर गुलजार खान 1976 से 1992 के बीच दुबई में रह कर टैक्सी चलाई. अब उनके दो बेटे दुबई में टैक्सी चलाते हैं. हर महीने करीब 50,000 रुपये घर भेज देते हैं. बाप बेटे की कमाई से घर चलता है. गुलजार खान अपनी जिंदगी से खुश हैं, दिक्कत बस इतनी है कि ये याद नहीं रख पाते कि किस बच्चे की मां कौन है. गुलजार कहते हैं, "मैं आपको ये तो बता सकता हूं कि कौन सा बच्चा मेरा है, लेकिन कौन सा किसका है, ये मत पूछिए." गुलजार आगे कहते हैं, 'हर वक्त बच्चों से घिरे रहने का एक और नुकसान है, मैं जब सोने जाता हूं तो दो तीन बच्चे तो मेरे आसपास ही रहते हैं. ऐसे में बीवियों के साथ अकेले कुछ पल बिताना बहुत मुश्किल हो जाता है.' गुलजार खान से जब पूछा गया कि क्या वह किसी तरह की दवा का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्होंने कहा, "बारह साल पहले मुझे दिल का दौरा पड़ा था. डॉक्टर ने मुझे खुश रहने की सलाह दी है. और खुश मैं तभी रहता हूं जब मेरी जरूरतें पूरी होती हैं."
कहानी यहीं खत्म नहीं होती है. बाप एक नंबरी तो बेटा दस नंबरी. गुलजार अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल हैं. 14 साल का एक बेटा अपनी शादी के सपने संजो रहा है, "इंशाल्लाह मेरी भी कई शादियां होंगी और मैं भी अपने पिता की ही तरह कई बच्चे पैदा करूंगा."

ये तो एक गुलजार खान की कहानी है. पाकिस्तान में ऐसे कितने गुलजार हैं जो बिना सोचे गुल खिला रहे हैं. महंगाई और परिवार नियोजन के पचड़े में आप पड़िए. गुलजार के सपने अपने हैं, मुंगेरी लाल के नहीं. गुलजार के दर्द में कुछ बात है...कुछ स्वेत हैं, कुछ श्याम हैं.

Sunday, July 13, 2014

हिंदुस्तान में हिंदुस्तानी भाषाओं से परहेज क्यों?

UPSC से सी-सैट प्रणाली हटाने के पक्ष में मैं भी हूं... हिंदी की बात करने पर तथाकथित अंग्रेजी जानने वालों का तर्क होता है कि जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती वही हिंदी की बात करते हैं. तो अंग्रेजी की वकालत करने वाले बताएं कि अगर उन्हें चीनी, जापानी, रसियन में प्रश्न पत्र मिले तो क्या करेंगे? विदेशी भाषाओं को छोड़िए, तेलगु, मराठी, तमिल, कन्नड़ में प्रश्न-पत्र मिले तो क्या लिखेंगे? भाषा की जानकारी रखना अच्छी बात है. हर किसी को कई भाषाओं की जानकारी लेने की कोशिश करनी चाहिए. लेकिन हिंदी, मराठी, तमिल, बंगाली या और कोई भारतीय भाषा बोलने वालों पर अंग्रेजी थोपना ठीक नहीं. वैसे प्रशासनिक सेवाओं में जरूरत की अंग्रेजी सबको आनी चाहिए. UPSC के माध्यम से चयनित छात्रों को देश में ही नौकरी करनी होती है. चयनित अधिकारियों को देवरिया, गोरखपुर, बक्सर, छपरा, पटना, पुणे जैसे जिलों में ड्यूटी बजानी पड़ती हैं. हां कुछ लोग कभी-कभी विदेश दौरे पर भी जाते हैं. उनके लिए अंग्रेजी की जानकारी जरूरी होती है. जिसके लिए अंग्रेजी माध्यम के छात्र मिल जाते हैं. सभी अधिकारी अमेरिका या ब्रिटेन में काम करने नहीं जाते. सी-सैट प्रणाली की वजह से छात्रों के ज्यादातर समय अंग्रेजी सीखने में ही खत्म हो जाता है. नतीजा ये होता है कि जरूरी जानकारी के अध्ययन के लिए समय नहीं मिलता. इसलिए सरकार को सी-सैट प्रणाली में सुधार करनी चाहिए. कोशिश होनी चाहिए कि चयन प्रक्रिया के बाद चयनित अधिकारियों को अंग्रेजी की जानकारी दी जाए. कोई जरूरी नहीं कि अंग्रेजी जानने वाला ज्ञानी हो. हिंदी, मराठी, ऊर्दू, तमिल, तेलगू जानने वाले को मूर्ख समझना मूर्खता की सबसे बड़ी पहचान होती है. अंग्रेजी जानना विकास और ज्ञानी होने का पैमाना नहीं. कई भाषा का ज्ञान अच्छी बात है लेकिन भाषाई भेद-भाव सबसे गंदी बात. अंग्रेजी को बढ़ावा देना सही लेकिन थोपना गलत. ये बिडंबना नहीं तो क्या है, 2013 की परीक्षा में कामयाब हुए 1122 छात्रों में सिर्फ़ 26 हिंदी माध्यम के हैं.
सवाल सिर्फ़ हिंदी का नहीं है 2013 की सिविल सेवा परीक्षा में सफल हिंदी छात्रों का प्रतिशत मात्र 2.3 ही है. जबकि 2003 से 2010 के बीच ऐसे छात्रों का प्रतिशत हमेशा 10 से ज़्यादा रहा है. 2009 में यह प्रतिशत 25.4 तक था. हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने वाले छात्र इसके लिए सी-सैट परीक्षा प्रणाली को ज़िम्मेदार मानते हैं.

Thursday, July 10, 2014

बचपन की कुछ बातें...

गांव के पूरब में घाघरा नदी आज भी बहती है... सावन, भादो में उसकी हरहराहट आज भी सुनाई देती है... ये नदी हर साल हम लोगों का नुकसान करती है. लेकिन 1998 में आई बाढ़ में जो नुकासन हुआ उसकी भरपाई अब कभी नहीं हो पाएगी. बाहरी लोग तो उसे बरगद का पेड़ कहते थे लेकिन हमारे गांव में वो शरधा बाबा थे. गांव की कई पीढ़ियां उस बरगद के पेड़ पर खेलते-खेलते जवान हुईं थी. हम लोग भी उस बरगद पर ओल्हा-पाती, छुआ-छुअंतन खेला करते थे. गांव की लड़कियां उस पर झूला झूलती थीं. बरगद की छांव में कीत-किता खेलती थीं. गांव की गढ़ई में घाघरा का पानी भर जाने के बाद बरगद की टहनियों से होकर हम लोग पानी में कूद-कूद कर नहाया करते थे. किसी साल जब मॉनसून दगा देने लगता था तो बारिश कराने के लिए गांव की महिलाएं रात में बरगद के नीचे इंद्र देव और शरधा बाबा से गुहार लगाती थीं. उनकी गीतों में भगवान से अपील होती थी. वो नाच कर इंद्र भगवान को मनाने की कोशिश करती थीं. हर रीति-रिवाज में उस बरगद का महत्व होता था. नाग पंचमी के दिन उसी पेड़ के नीचे हम लोग चिक्का खेलते थे. लड़ाई भी होती थी. गांव के पहलवान मोहन, वीरा, कन्नू पंडित और कई नौजवान अपने शरीर पर माटी रगड़कर अपने पहलवानी का नमूना दिखाते थे. रजूआ (राजू), संजवा (संजय), हिटलरवा (सत्येंद्र), मोटका (धर्मेंद्र), ललूआ, बरईठा और कई नौजवान कबड्डी और गोली (कंचा) खेला करते थे. बरगद के नीचे बहुत ही मौज की जिंदगी कटती थी. बरफ (आइसक्रिम), तरबूज बेचने वाले भी यहीं आकर रुकते और हुंक्कार लगाते थे. गर्मी के दिनों में पूरा गांव, राहगीर भी बरगद के नीचे आराम फरमाते थे. बरगद इतना विशालकाय था कि पूरा गांव उसकी छांव में राहत की सांस लेता था... यहीं नहीं 1998 में आई बाढ़ से गांव पर खतरा मंडराने लगा. हमारे घर से मात्र सौ मीटर की दूरी पर बांध टूट गया था. किसी भी पल गांव घाघरा में समा जाता लेकिन बरगद ने अपना बलिदान देकर हमारे टोले को बचा लिया. बरगद के गिर जाने से बांध की कटान रूक गई... इन तस्वीरों ने शरधा बाबा और उस बरगद की याद दिला दी.. और बरगद के नीचे बीताए गए पल, दोस्त भी याद आ गए.....


चिल्ल पों मचाने से काम नहीं चलेगा...

चकरोड से गुजरते हुए हरिकांत की मां कहती थीं 'हमरिओ घरवा तनी लौकिया और कोहडवा भेजवा देतअ'. ललूआ की मां कहती थीं 'तनी टमाटर और घेंवडवा दे देतअ एक बेरा के काम चल जाइत'... दादी कहती था 'तनी प्याज, दाल, कोहड़ा और लौकी अपनी बुआ के घर दे आव...का होई.. इतना तो बहुत बा'... ये उन दिनों की बात है जब मैं गांव में रहता था. मां गऊशाला के छप्पर पर, नीम के पेड़ पर और चकरोड के किनारे घिया, कद्दू, नेनुआ के बीज बो देती थीं. देखते-देखते जमीन से लेकर नीम के पेड़ तक हरी सब्जियां फलने लगती थीं. हम सभी भाई मिलकर आलू, प्याज, टमाटर, मूली, गोभी, भिंडी, पालक की पर्यापत मात्रा में खेती कर लेते थे. हम लोग तो खाते ही थे आस पड़ोस में भी बांट दिया जाता था. रिश्तेदारों के यहां भी भिजवा दिया जाता था. उस समय हमारे यहां कोई ट्रैक्टर नहीं था. बैल से खेती होती थी. बड़े पिताजी के लड़के विजयी भाई हल चलाना जानते थे. धीरे-धीरे मैंने भी सीख लिया था. सुबह होते ही विजयी भाई, मैं और मेरे बड़े भाई हल और बैल लेकर खेत में चले जाते. सुबह आठ बजे तक हल से खेत की जुताई करते थे, फिर दादाजी के आने के बाद हम लोग पढ़ने के लिए भाग जाते. शाम को स्कूल से लौटकर फिर खेतों में जुट जाते. गाय-भैंस को खिलाने-पिलाने के बाद पढ़ाई होती थी. मैं पढ़ने में काफी लापरवाह था. मेरे बड़े भाई घर का काम करने के बाद भी वो मन लगा कर पढ़ते थे. हम लोग सब्जियों की खेती करने में काफी रूचि रखते थे. घर के आस पास फूल भी लगाते थे. मां, दादी, बुआ के हाथों लगी सब्जियां काफी फलती थीं. लोग कहते थे कि तुम्हारी मां, बड़ी वाली बुआ के हाथ में जादू है क्या? कोई भी सब्जी लगा देती हैं बरकत ही होता है.

लेकिन आज देखिए वही खेत, वही गांव, सबकुछ वही है, अगर कुछ बदला है तो लोगों की सोच, बाजार पर निर्भरता, ट्रैक्टर, ट्यूबेल होने के बावजूद एक जून की सब्जी भी उगाने में नानी याद आ जाती है. फालतू के तर्क और दिखावे के बुशर्ट पहनकर गांव में घुमते मिलते हैं नौजवान. घर का मालिक अगर कोई काम कह दे तो घर के नौजवान तपाक से जवाब देते हैं 'मैं यही काम करूंगा, पैसा है तो जाइए बाजार से खरीद लाइए'... घर के गार्जियन क्या करें. हां कुछ लोग अब भी है जो खेती-बाड़ी को जिंदा रखे हुए हैं. मेहनत करके कम से कम अपने लिए अनाज और सब्जियां तो उगा ही लेते हैं...

ये बातें मुझे इसलिए याद करनी पड़ी क्योंकि, महंगाई को लेकर खूब चिल्ल-पों हो रही है. सब बजारू हो गए हैं. कोई भी सरकार हो, उसको गाली देना फैशन बन गया है. सरकार भी अनाज, सब्जियों के पैदावार से ज्यादा जोर मीडिया मैनेजमेंट पर जोर दे रही है. लोग भी इतने काहिल हो चुके हैं कि खुद कुछ करना नहीं चाहते और दूसरों पर दोष मढ़ते जा रहे हैं. शहर तो बाजार पर ही निर्भर है लेकिन अब गांव भी बाजार के भरोसे जीने लगा है. लोग सब्जियां पैदा करने के वजाय बाजार से खरीदना ज्यादा उचित समझते हैं. क्योंकि इसके पीछे तर्क देते हैं कि जितनी लागत में सब्जियां ऊगाओ उतने में बाजार से सब्जियां मिल जाती हैं. लेकिन ये नहीं सोचते कि यदि बाजार पर इस तरह से निर्भर रहेंगे तो बाजार ब्लैकमेल करने लगेगा. अगर लागत के बराबर भी उपज हो रही है तो क्या हर्ज है? कम से कम ताजी-सब्जियां तो मिल रही हैं. बाजार में मांग नहीं बढ़ेगी. और जब मांग नहीं बढ़ेंगी तो महंगाई कहां से बढ़ेगी?