Saturday, August 29, 2015

#मोहन_राकेश #ऑस्ट्रेलिया #हिंदी

ऑस्ट्रेलिया में "आषाढ़ का एक दिन" का मंचन
"…फिर धीरे-धीरे धीमा पड़कर विलीन हो जाता है। परदा धीरे-धीरे उठता है।" ~ मोहन राकेश, 'आषाढ़ का एक दिन'
 “आषाढ का पहला दिन और ऐसी वर्षा माँ! ऐसी धारासार वर्षा! दूर-दूर तक की उपत्यकाएँ भीग गईं।”
~ मोहन राकेश, ‘आषाढ़ का एक दिन’


 हम लोग थियेटर में बैठकर "आषाढ़ का एक दिन" देखने को तैयार है! क्या बात है

तस्वीरें @iawoolford के ट्विटर वॉल से ली गई हैं।

Friday, August 7, 2015

खुशियों और ख्वाहिशों का बज़ट!

बज़ट हर महीने बनाती हूँ अपनी खुशियों और ख्वाहिशों का बज़ट। और देखों ये हर महिने बढ़ जाता है। ऐसे तो नज़र लग जाएंगी हमें ...सुनों तुम आते समय कुछ काले धागे और नींबू मिर्च की वो लटकन लेते आना। मैं क्या करूं , तुम्हारी मोहब्बत की सुर्खियां मेरे चेहरे पर झिलमिलाती है...सबको दिख ही जाती है। मुझे श्रृंगार की ज़रूरत ही नही पड़ती ख़ुद को सवांरने के लिए। बस बहुत होती है उम्मीदों की एक छोटी सी लाल बिंदी और सदके का काज़ल। सारे सपनों को चोटी से बाँध कर विश्वास का एक गज़रा लगा लेती हूँ।
जब भी घर से निकलती हूँ लोग उचक उचक कर देखते है, इन खुशियों की चमक को जो मंद मंद मुस्कान बन कर मेरे अधरों पर बिखरी रहती है। गाहे बगाहे कोई न कोई पूछ ही लेता है, इस अद्भुत सौंदर्य का कारण। सोचती हूँ क्या-क्या बताऊँ इन्हें अपने इस अलौकिक प्रेम के बारे में। हम अज़नबी से पक्के दोस्त बने, दोस्त से प्यार के पंछी बने , फ़िर हमसफ़र बने और उसके बाद पति-पत्नी। हमारे रिश्ते का ये बीज़ जो बोया था हमने 13साल पहले, वक़्त की खाद और धैर्य के पानी से सींचा है, तभी तो आज विश्वास के फूल आते है इसपे जिसका

मैं गज़रा लगाती हूँ। फ़िर सोचती हूँ इन्हें बता के क्या करूँगी? ये जो रिश्ता है अपना तुम जानते हो मैं जानती हूँ, बहुत है इतना। बस तुम को काला धाग़ा लेते आना उसे बांध दूँगी घर के बाहर ताकि किसी की बुरी नज़र न लगे मेरे घर के बढ़ते बज़ट को...!

संध्या कश्यप के फेसबुक वॉल से... 

वाल्मीकि से भी महर्षि की उपाधि छीन लो…

अच्छा हुआ ऋषिवर आप इस युग में पैदा नहीं हुए वरना एक डाकू को हमारी मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी महर्षि बनने नहीं देते। रत्नाकर कभी भी संन्यास नहीं ले पाता। रामायण की जगह वो ‘अधूरा ख्वाब’ लिखा होता। हम उसकी समीक्षा छापते और उसकी लेखन शैली की तारीफ करते नहीं अघाते। सच्चिदानंद तो अव्वल दर्जे का मूरख है।

 दिल्ली-एनसीआर में बियर शॉप और रियल स्टेट का कारोबार। एक आम आदमी के लिए ये बहुत बड़ा सपना। और तुम सबकुछ छोड़ छाड़कर सन्यासी बन गए। संन्यास लेना सबके बस की बात नहीं। वह भी तब जब वो संपन्न हो।जब आदमी अपने इन सपनों को पूरा करने के सुबह से शाम तक झूठ और फरेब करता है। कुछ जी तोड़ मेहनत करते हैं तब भी तुम जितना बना लिए थे वहाँ तक नहीं पहुंच पाते। तुमने ये सब हासिल कर भगवा चोला पहना। मोह माया से दूर हो गए। महामंडलेश्वर बन गए। लेकिन तुम्हारा अतीत तुम्हारे पीछे पड़ गया। यही मात खा गए महराज। उस समय पत्रकार के रूप में नारद जी थे।आज हम लोग हैं।ऐसा आग लगाये की गांजा पीने वाले संत भी आपके खिलाफ सुलगने लगे।भूल गए संन्यास और सन्यासी की परिभाषा। दौड़ पड़े कौए के पीछे बिना अपना कान चेक किये। 

सच्चिदानंद को फिर हमने बिल्डर बाबा बना दिया। महामंडलेश्वर की पदवी छिनवा ली। हमारा बस चले तो हम रत्नाकर उर्फ़ महर्षि वाल्मीकि से महर्षि का पद छीन लें। हम इस लोकतान्त्रिक देश में सर्वशक्तिशाली हैं। सनी लियोन पर पैनल डिस्कशन कराते हैं पर इतना नहीं जानते कि सारे सद्कर्म कुकर्म करने के बाद आई विरक्ति से ही संन्यास का रास्ता निकलता है।

(पत्रकार दृगराज मद्धेशिया के फेसबुक वॉल से.) 

Tuesday, August 4, 2015

वियना समझौते के मायने

यदि हम ईरान और अयातुल्ला खुमैनी को जानते हैं, यदि हम रूस, चीन और मध्य-पूर्व एशिया के देशों से ईरान के गहरे रिश्तों को जानते हैं, और यदि हम अमेरिका और यूरोपीय संघ के नेतृत्वकर्ता देशों को जानते हैं, तो यह कहने में हमें कोई हिचक नहीं होगी कि 18 दिनों की लंबी वार्ता के बाद दुनिया के 6 ताकतवर देशों और ईरान के बीच हुआ 14 जुलाई का वियना समझौता स्थाई नहीं है।

यह मानी हुई बात है, कि ईरान अपने संबधों का आधार नहीं बदलेगा और यूरो-अमरिकी साम्राज्यवाद वित्तीय ताकतों के गिद्धों का ऐसा समूह है, जो किसी भी देश के प्राकृतिक संपदा का मांस खाये बिना नहीं रह सकता। कह सकते हैं, कि दुनिया के बाजार में अमेरिकी डॉलर वित्तीय ताकतों का कारगर हथियार है। जिसका उपयोग अमेरिकी सरकार और साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में रखने के लिये कर रही है, जिसका मकसद वैकल्पिक व्यवस्था को रोकना है।
और हम इस बात को जानते हैं, कि चीन के युआन ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में वैकल्पिक मुद्रा व्यवस्था की चुनौतियां खड़ी कर दी है। एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक और ब्रिक्स बैंक की स्थापना भी हो गई है। जिसके प्रमुख सहयोगी ब्रिक्स देश- चीन, रूस, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका है। रूस, चीन और लातिनी अमेरिकी देशों के संगठनों की साझेदारी ने तथा एशिया के गैर अमेरिकी देशों, जिसमें ईरान भी है, की साझेदारी ने, नये भौगोलिक कूटनीतिक और सामरिक समीकरण को जन्म दे दिया है। जिसके सामने गैर अमेरिकी वैश्वीकरण है। मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करना है।

ईरान से हुए इस समझौते का सच यह है, कि यह समझौता ईरान को रूस और चीन के खेमे से निकालने की यूरो-अमेरिकी कवायद है, जिसमें रूस और चीन की भी मौजूदगी है और यहीं वह गंभीर सवाल है, कि क्या ओबामा सरकार और यूरोपीय देश इतने कामयाब हैं? क्या यह हो सकता है? इस समझौते के सबसे महत्वपूर्ण बिंदू के रूप में यह प्रचारित किया जा रहा है, कि ईरान अपने ऊपर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध को हटाने की शर्त पर परमाणु हथियारों का निर्माण रोकने पर राजी हो गया है। जबकि सच यह है, कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम में परमाणु हथियार बनाने जैसी कोई बात ही नहीं है, और इस बात को अमेरिका और यूरोपयी देश भी जानते हैं। अंतर्राष्ट्रीय पर्वेक्षकों की रिपोर्ट भी यही है। अमेरिकी गुप्तचर इकाई (सीआईए) की गुप्त रिपोर्ट से भी यही प्रमाणित होता है। इसके बाद भी उसे प्रतिबंधों का सामना बरसों करना पड़ा। जिसके खिलाफ रूस, चीन और उनके सहयोगी देशों एवं संगठनों का सहयोग ईरान को मिला।

क्या ईरान की कोई भी सरकार इस बात को भूल सकती है? या वह अपने कूटनीतिक एवं वित्तीय संबंधों का आधार बदल सकती है? ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वजह से उस पर पश्चिमी देशों ने जो प्रतिबंध लगाये, उसकी वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी नुक्सान उठाना पड़ा। अमेरिका के दबाव की वजह से ही यूरोपीय और अमेरिकी बैंकों में जमा किये गये धनराशि को जप्त करने से उसे 100 बिलियन डॉलर की क्षति हुई। उसके कई परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या कराई गयी, और इजरायल ने अमेरिका के साथ मिल कर ईरान के 'न्यूक्लियर प्रोडक्शन कम्प्यूटर सिस्टम' को एक वायरस के जरिये 'हैक' भी किया। ईरान के खाद्य पदार्थ और दवाओं के आयात को भी यूरो-अमेरिका ने रोक दिया। ईरान की अर्थव्यवस्था को तोड़ने, जन-असंतोष को बढ़ाने और उसकी राजनीतिक संरचना को बदलने की कोशिश की गई। दुनिया के सभी देशों पर प्रतिबंधों को लागू करने का दबाव बनाया गया।

और अब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस समझौते से ईरान का उपयोग रूस को कमजोर करने के लिये करना चाहते हैं। माना यही जा रहा है, कि यह समझौता रूस के विरुद्ध ओबामा की कूटनीतिक चाल है, जिसका मकसद रूस की अर्थव्यवस्था को ऐसा झटका देना है, कि वह वित्तीय संकट से उबर न पाये। जो काम वो यूक्रेन के माध्यम से करना चाहते थे, जहां उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा, अब वो ईरान के माध्यम से करने की नीति पर चल रहे हैं। इस समझौते के तहत तेहरान अपने परमाणु क्षमता को कम से कम 10 सालों तक उल्लेखनीय ढंग से सीमित रखेगा, और इसके बदले में दुनिया की 6 बड़ी शक्तियां इस बात से सहमत हैं, कि ईरान के खिलाफ लगे अंतर्राष्ट्रीय तेल एवं वित्तीय प्रतिबंधों को वो हटा लेंगी। यह प्रतिबंध अमेरिका, यूरोपीय देश उनके सहयोगी देशों (इजरायल सहित) के द्वारा पिछले 12 सालों से ईरान पर थोपा गया था। जिसका घोषित लक्ष्य उसके परमाणु कार्यक्रमों को रोकना था, ताकि वह परमाणु हथियारों का निर्माण न कर सके। जबकि ईरान की ऐसी कोई योजना कभी नहीं थी।

इजरायल आज भी ईरान को अपने लिये और दुनिया के लिये खतरा मानने की नीति पर अड़ा हुआ है। उसके प्रधानमंत्री ने कहा है कि ईरान के साथ हुए इस परमाणु समझौते के बाद दुनिया कल के मुकाबले आज ज्यादा खतरनाक जगह बन गई है। उन्होंने कहा कि हम हमेशा अपना बचाव करेंगे, यह समझौता ईरान को सैंकड़ों बिलियन डॉलर का अप्रत्याशित लाभ देगा, जिसका उपयोग वह इजरायल को नष्ट करने के लिये अपनी ताकत को बढ़ाने में करेगा। 

Ankur Vijaivargiya
Senior Correspondent
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