Thursday, July 10, 2014

बचपन की कुछ बातें...

गांव के पूरब में घाघरा नदी आज भी बहती है... सावन, भादो में उसकी हरहराहट आज भी सुनाई देती है... ये नदी हर साल हम लोगों का नुकसान करती है. लेकिन 1998 में आई बाढ़ में जो नुकासन हुआ उसकी भरपाई अब कभी नहीं हो पाएगी. बाहरी लोग तो उसे बरगद का पेड़ कहते थे लेकिन हमारे गांव में वो शरधा बाबा थे. गांव की कई पीढ़ियां उस बरगद के पेड़ पर खेलते-खेलते जवान हुईं थी. हम लोग भी उस बरगद पर ओल्हा-पाती, छुआ-छुअंतन खेला करते थे. गांव की लड़कियां उस पर झूला झूलती थीं. बरगद की छांव में कीत-किता खेलती थीं. गांव की गढ़ई में घाघरा का पानी भर जाने के बाद बरगद की टहनियों से होकर हम लोग पानी में कूद-कूद कर नहाया करते थे. किसी साल जब मॉनसून दगा देने लगता था तो बारिश कराने के लिए गांव की महिलाएं रात में बरगद के नीचे इंद्र देव और शरधा बाबा से गुहार लगाती थीं. उनकी गीतों में भगवान से अपील होती थी. वो नाच कर इंद्र भगवान को मनाने की कोशिश करती थीं. हर रीति-रिवाज में उस बरगद का महत्व होता था. नाग पंचमी के दिन उसी पेड़ के नीचे हम लोग चिक्का खेलते थे. लड़ाई भी होती थी. गांव के पहलवान मोहन, वीरा, कन्नू पंडित और कई नौजवान अपने शरीर पर माटी रगड़कर अपने पहलवानी का नमूना दिखाते थे. रजूआ (राजू), संजवा (संजय), हिटलरवा (सत्येंद्र), मोटका (धर्मेंद्र), ललूआ, बरईठा और कई नौजवान कबड्डी और गोली (कंचा) खेला करते थे. बरगद के नीचे बहुत ही मौज की जिंदगी कटती थी. बरफ (आइसक्रिम), तरबूज बेचने वाले भी यहीं आकर रुकते और हुंक्कार लगाते थे. गर्मी के दिनों में पूरा गांव, राहगीर भी बरगद के नीचे आराम फरमाते थे. बरगद इतना विशालकाय था कि पूरा गांव उसकी छांव में राहत की सांस लेता था... यहीं नहीं 1998 में आई बाढ़ से गांव पर खतरा मंडराने लगा. हमारे घर से मात्र सौ मीटर की दूरी पर बांध टूट गया था. किसी भी पल गांव घाघरा में समा जाता लेकिन बरगद ने अपना बलिदान देकर हमारे टोले को बचा लिया. बरगद के गिर जाने से बांध की कटान रूक गई... इन तस्वीरों ने शरधा बाबा और उस बरगद की याद दिला दी.. और बरगद के नीचे बीताए गए पल, दोस्त भी याद आ गए.....


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