Thursday, February 14, 2008

मैं तो....... क्योंकि मैं किसान हूँ ....

नेताजी पूछे तुम कौन हो ....?
मैंने बोला , मैं इन्सान हूँ ....क्या तेरे पास गाड़ी है ...?
हाँ मेरे पास बैलगाडी है ....नेताजी, वैश्वीकरण के इस युग में बैलगाडी.... ?
हाँ , ये भारत की सवारी है ...नेताजी , अरे ! मैं तो सस्ते दर पर क़र्ज़ की व्वस्था किया है ... ?
हाँ , इसीलिए मोतिया ने आत्महत्या किया है .... ?
नेताजी , आत्महत्या ? ये जरूर विपक्षी पार्टी की चाल है...?
नहीं, यह तो आपके कमीशन का कमाल है ....?
नेताजी , चलो ठीक है.... अब बताओ तुम्हारे घर क्या -क्या है...?
जानवरों के गोबर से जलाता हूँ चूल्हा, मिटटी का घर है लेकिन छत है खुला
पानी इतना है कि बस हो पाता है कुल्ला
खाने में सुखी रोटी और नसीब से दाल का दूल्हा
मैं तो दबा , कुचला एक इन्सान हूँ ............. क्योंकि मैं भारत का किसान हूँ ...

3 comments:

Asha Joglekar said...

सच कहे हो भैया । इस देश के १०० में से ७० लोग दबे कुचले ही हैं ।mii

Anonymous said...

एक किसान का दर्द ये नासपीटे नेता क्या जानेंगे । आज जब किसान का दिन आया गेंहू बेचने का तब सरकारी रेट 900 रू0 क्विंटल है और जब इनके गोदाम भर जायेंगे तब ये 1500 रू0 क्विंटल गेंहू बाजार में बेचेंगे । क्या कीजियेगा । हमारा अन्नदाता ही खुद एक एक दाने को मोहताज है आज ।

आपकी टिप्पणी भड़ास पर पढ़ी । जान कर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई कि मेरा व्यंग्य ‘बाप पादै न जाने, पूत शंख बजावै’ पढ़ कर आपकी हंसी नहीं रूक रही थी । यकीन मानिये सत्येंद्रजी, आपकी हंसी ही मेरा पारिश्रमिक है । आपको मेरा लिखा पसंद आया, मेरा लिखना सफल हो गया ।

आपका
कृष्ण मोहन मिश्र

Ram Shiv Murti Yadav said...

काफी धारदार लिखते हैं आप...बधाई स्वीकारें

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