बज़ट हर महीने बनाती हूँ अपनी खुशियों और ख्वाहिशों का बज़ट। और देखों ये हर महिने बढ़ जाता है। ऐसे तो नज़र लग जाएंगी हमें ...सुनों तुम आते समय कुछ काले धागे और नींबू मिर्च की वो लटकन लेते आना। मैं क्या करूं , तुम्हारी मोहब्बत की सुर्खियां मेरे चेहरे पर झिलमिलाती है...सबको दिख ही जाती है। मुझे श्रृंगार की ज़रूरत ही नही पड़ती ख़ुद को सवांरने के लिए। बस बहुत होती है उम्मीदों की एक छोटी सी लाल बिंदी और सदके का काज़ल। सारे सपनों को चोटी से बाँध कर विश्वास का एक गज़रा लगा लेती हूँ।
जब भी घर से निकलती हूँ लोग उचक उचक कर देखते है, इन खुशियों की चमक को जो मंद मंद मुस्कान बन कर मेरे अधरों पर बिखरी रहती है। गाहे बगाहे कोई न कोई पूछ ही लेता है, इस अद्भुत सौंदर्य का कारण। सोचती हूँ क्या-क्या बताऊँ इन्हें अपने इस अलौकिक प्रेम के बारे में। हम अज़नबी से पक्के दोस्त बने, दोस्त से प्यार के पंछी बने , फ़िर हमसफ़र बने और उसके बाद पति-पत्नी। हमारे रिश्ते का ये बीज़ जो बोया था हमने 13साल पहले, वक़्त की खाद और धैर्य के पानी से सींचा है, तभी तो आज विश्वास के फूल आते है इसपे जिसका
मैं गज़रा लगाती हूँ। फ़िर सोचती हूँ इन्हें बता के क्या करूँगी? ये जो रिश्ता है अपना तुम जानते हो मैं जानती हूँ, बहुत है इतना। बस तुम को काला धाग़ा लेते आना उसे बांध दूँगी घर के बाहर ताकि किसी की बुरी नज़र न लगे मेरे घर के बढ़ते बज़ट को...!
संध्या कश्यप के फेसबुक वॉल से...
जब भी घर से निकलती हूँ लोग उचक उचक कर देखते है, इन खुशियों की चमक को जो मंद मंद मुस्कान बन कर मेरे अधरों पर बिखरी रहती है। गाहे बगाहे कोई न कोई पूछ ही लेता है, इस अद्भुत सौंदर्य का कारण। सोचती हूँ क्या-क्या बताऊँ इन्हें अपने इस अलौकिक प्रेम के बारे में। हम अज़नबी से पक्के दोस्त बने, दोस्त से प्यार के पंछी बने , फ़िर हमसफ़र बने और उसके बाद पति-पत्नी। हमारे रिश्ते का ये बीज़ जो बोया था हमने 13साल पहले, वक़्त की खाद और धैर्य के पानी से सींचा है, तभी तो आज विश्वास के फूल आते है इसपे जिसका
मैं गज़रा लगाती हूँ। फ़िर सोचती हूँ इन्हें बता के क्या करूँगी? ये जो रिश्ता है अपना तुम जानते हो मैं जानती हूँ, बहुत है इतना। बस तुम को काला धाग़ा लेते आना उसे बांध दूँगी घर के बाहर ताकि किसी की बुरी नज़र न लगे मेरे घर के बढ़ते बज़ट को...!
संध्या कश्यप के फेसबुक वॉल से...


1 comment:
बहुत सुंदर लेखनी
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